फियांग, लद्दाख। जनवरी 2013।
ज़मीन इतनी ठंडी थी कि सोनम वांगचुक के जूतों के नीचे मिट्टी पत्थर की तरह लग रही थी। हवा का तापमान माइनस अठारह डिग्री था। पूरा गाँव बर्फ की चादर के नीचे सो रहा था।
लेकिन सोनम सो नहीं पा रहे थे।
वो खेत के बीच में खड़े थे, हाथ में एक छोटी सी टॉर्च, और सामने एक पुल के नीचे एक चीज़ देख रहे थे जो उन्हें पिछले एक हफ़्ते से परेशान कर रही थी।
बर्फ का एक छोटा सा ढेर।
पुल के नीचे, छाया में, जहाँ धूप कभी नहीं पहुँचती थी, वहाँ एक पाइप से रिसता हुआ पानी जम कर खड़ा था। बाहर बाकी सारा पानी फरवरी के अंत तक पिघल चुका होता। लेकिन यहाँ, इस छाँव में, बर्फ मई तक टिकी रहती थी।
सोनम ने टॉर्च बंद की। आसमान में तारे थे, इतने साफ़ कि लगता था हाथ बढ़ाकर छू लें।
“छाया,” उन्होंने धीरे से कहा। अपने आप से।
बस छाया चाहिए। बर्फ को मई तक रखने के लिए सिर्फ़ छाया चाहिए।
लद्दाख में पानी की कहानी बहुत पुरानी थी।
यहाँ बारिश नहीं होती। साल भर में कुल मिलाकर पचास मिलीमीटर। राजस्थान से भी कम। तो पानी आता कहाँ से था? ग्लेशियर से। पहाड़ों की चोटी पर जमी बर्फ़ धीरे-धीरे पिघलती और नदियों में बहती।
लेकिन एक दिक्कत थी।
ग्लेशियर मई के अंत में पिघलना शुरू करते थे। और किसानों को पानी अप्रैल में चाहिए होता — जब बीज बोने का वक्त होता है।
मई तक देर हो जाती। बीज सूख जाते। फ़सल नहीं उगती।
और पिछले कुछ सालों से तो हाल और बुरा था। जलवायु बदल रही थी। ग्लेशियर पीछे हट रहे थे। कई गाँव खाली हो रहे थे क्योंकि लोगों के पास खेती के लिए पानी ही नहीं था।
सोनम इस समस्या को बीस साल से देख रहे थे।
उन्होंने SECMOL नाम का एक स्कूल बनाया था 1988 में — उन बच्चों के लिए जिन्हें सरकारी स्कूल “फेल” कह कर निकाल देती थी। वो स्कूल खुद बच्चों ने बनाया था, मिट्टी और सोलर पैनल से। सर्दियों में बिना हीटर के अंदर पंद्रह डिग्री गर्म रहता था।
लेकिन स्कूल अलग बात थी। पानी अलग।
पानी के बारे में उन्होंने एक थ्योरी बनाई थी। कई साल पहले उनके इंजीनियर दोस्त चेवांग नॉरफेल ने “आर्टिफिशियल ग्लेशियर” बनाए थे — पहाड़ों की ऊँचाई पर पानी को सर्दियों में फैला कर जमा देना ताकि वो वसंत में पिघले।
आइडिया अच्छा था। पर एक समस्या थी।
ये ग्लेशियर बहुत ऊँचाई पर बनाने पड़ते थे — 4,000 मीटर से ऊपर। वहाँ पहुँचना मुश्किल था। और वो ज़मीन पर फैले होते थे — एक हॉरिज़ॉन्टल चादर। सूरज सीधे उन पर पड़ता था और वो जल्दी पिघल जाते थे।
सोनम कई महीनों से सोच रहे थे: अगर बर्फ को सूरज से बचाया जा सके तो?
और उस रात पुल के नीचे, उन्हें जवाब मिल गया।
ऊँचाई से नहीं। आकार से।
अगर पानी को एक ऐसे आकार में जमाया जाए जो खुद अपनी ज़्यादातर सतह को छाया में रखे — एक मीनार की तरह, ऊँचा और पतला — तो वो बहुत कम धूप सोखेगा। एक गोल कोन। एक स्तूप।
बर्फ का स्तूप।
घर लौटते वक्त सोनम के हाथ ठंड से सुन्न थे लेकिन दिमाग में एक अजीब सी गर्मी थी।
अगले दिन उन्होंने एक काग़ज़ निकाला और पेंसिल से एक त्रिकोण बनाया।
ऊपर पतला। नीचे चौड़ा। एक बौद्ध स्तूप जैसा।
फिर उन्होंने नीचे से एक तीर खींचा — पाइप। पानी पहाड़ से नीचे आएगा। ग्रैविटी से। बिना किसी पंप के, बिना बिजली के। एक नली में दबाव बनेगा क्योंकि पानी का स्रोत ऊँचाई पर होगा। और उस दबाव से पानी ऊपर की तरफ फव्वारे की तरह निकलेगा।
सर्दी की हवा में वो फव्वारा जमता जाएगा। बूँद बूँद। परत दर परत। एक कोन बनता जाएगा।
उन्होंने पन्ने के नीचे लिखा — “Ice Stupa”।
ये दो शब्द उन्होंने तब लिखे थे जब उन्हें खुद यकीन नहीं था कि ये काम करेगा।
पहला प्रोटोटाइप उन्होंने उसी सर्दी में बनाया।
SECMOL कैंपस के पास, एक छोटे से पाइप से, उन्होंने दो मीटर ऊँचा एक छोटा सा कोन जमाने की कोशिश की।
ये एक तरह का कुछ काम कर गया। बर्फ बनी। पर बहुत असमान। एक तरफ ज़्यादा, दूसरी तरफ कम। हवा का असर पड़ रहा था।
लोग देखने आए। कुछ ने कहा कि ये पागलपन है।
एक बूढ़े आदमी ने पूछा — “सोनम, अगर बर्फ ही बनानी थी तो भगवान ने हमें इतनी सर्दी क्यों दी?”
सोनम हँसे। पर अंदर ही अंदर डरे हुए थे।
पैसे एक बड़ी समस्या थी।
असली स्केल पर एक स्तूप बनाने के लिए — जो सच में किसी गाँव की मदद कर सके — कम से कम तीस लाख रुपये चाहिए थे। पाइप, टेस्टिंग, मज़दूरी, गाँव वालों को मनाना।
सोनम के पास इतने पैसे नहीं थे।
उन्होंने एक काम किया जो उस वक्त बहुत अजीब लगा था — एक क्राउडफंडिंग कैंपेन शुरू किया। इंटरनेट पर। 2014 के शुरू में, जब भारत में बहुत कम लोगों ने इस शब्द को सुना था।
उन्होंने वीडियो बनाया। अपने टूटे-फूटे प्रोटोटाइप के साथ खड़े होकर। बोले — “मुझे पता है ये अजीब लगता है। एक बर्फ की मीनार। लेकिन अगर ये काम कर गया, तो लद्दाख के सौ गाँव बच जाएँगे।”
पैसा आया। दुनिया भर से। पच्चीस लाख से ज़्यादा। ज़्यादातर पैसा उन लोगों ने दिया जो लद्दाख कभी आए भी नहीं थे।
जनवरी 2014 की एक रात।
फियांग गाँव से दो किलोमीटर ऊपर, एक चट्टान से, सोनम और उनकी टीम ने एक तीन किलोमीटर लंबी पाइप बिछाई थी। एक नदी से। पाइप का दूसरा सिरा एक खेत में खुलता था — ज़मीन से लंबवत, आसमान की तरफ।
रात के दो बजे थे। तापमान माइनस बीस।
टीम के सब लोग थक चुके थे। कई दिनों से सो नहीं रहे थे।
सोनम ने वॉल्व खोला।
पाइप में हवा फँसी थी पहले। फिर एक झटका। फिर पानी का एक तेज़ फव्वारा — सीधा ऊपर, चार-पाँच मीटर हवा में।
और कुछ नहीं हुआ।
सब चुपचाप देख रहे थे। पानी बस गिर रहा था। ज़मीन गीली हो रही थी। बर्फ नहीं बन रही थी।
सोनम ने अपनी घड़ी देखी।
“वक्त दो,” उन्होंने कहा।
सुबह छह बजे जब वो खेत में लौटे, सूरज अभी नहीं निकला था। बस आसमान का रंग धीरे-धीरे नीला हो रहा था।
और खेत के बीच में, अंधेरे में, एक चीज़ खड़ी थी।
एक मीटर ऊँची। बर्फ की। चमकती हुई।
सोनम कुछ देर बस उसे देखते रहे।
फिर उन्होंने अपने एक छात्र से कहा — “इसे रोज़ नापना। हर सुबह।”
अगले तीन महीनों में वो छोटा सा कोन बढ़ता गया।
दो मीटर। तीन। पाँच। आठ।
फरवरी के अंत तक वो बीस मीटर ऊँचा हो चुका था।
64 फीट।
एक छह मंज़िला इमारत जितना। बर्फ से बना।
लोग देखने आने लगे। पहले गाँव से, फिर लेह से, फिर दिल्ली से, फिर बाहर के देशों से। लद्दाख के एक खाली खेत में एक बर्फ की मीनार खड़ी थी।
मार्च आया। फिर अप्रैल।
बाकी सारी बर्फ पिघल चुकी थी। पहाड़ काले दिख रहे थे। नदियाँ अभी सूखी थीं — ग्लेशियर का पानी अभी नहीं आया था।
लेकिन फियांग में एक चीज़ अलग थी।
बर्फ का स्तूप पिघल रहा था। धीरे-धीरे। हर दिन थोड़ा-थोड़ा। और उससे रिसता पानी — एक नाली से होकर — सीधे खेतों में जा रहा था।
मई में, जब किसानों को बीज बोने थे, उनके पास पानी था।
पहली बार।
सोनम वांगचुक उस खेत में फिर एक रात अकेले गए थे। मई की शुरुआत में। जब स्तूप अब बस आधा रह गया था — एक झुकता हुआ बूढ़ा सा कोन।
उन्होंने उसे हाथ से छुआ।
ठंडा था अभी भी।
उन्हें वो जनवरी 2013 की रात याद आई — पुल के नीचे, टॉर्च की रोशनी में, पाइप से रिसता हुआ पानी। और एक सवाल जिसका जवाब उस वक्त किसी के पास नहीं था।
बर्फ को छाया चाहिए। बस इतना ही।
कभी-कभी सबसे बड़ी इंजीनियरिंग सबसे छोटी बात होती है।
आज लद्दाख में बीस से ज़्यादा गाँवों में बर्फ के स्तूप बनते हैं। कुछ अस्सी फीट के। कुछ सौ के। एक गाँव में एक स्तूप अब तक का सबसे बड़ा — डेढ़ करोड़ लीटर पानी अपने अंदर रखता है।
सोनम वांगचुक को 2018 में रैमॉन मैगसैसे पुरस्कार मिला — एशिया का नोबेल। पर उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके लिए असली पुरस्कार वो दिन था जब फियांग के एक किसान ने उन्हें एक सेब दिया — और कहा, “ये उस खेत से है जहाँ कुछ नहीं उगता था।”
वो काग़ज़ जिस पर उन्होंने पहली बार त्रिकोण बनाया था — वो आज भी SECMOL की दीवार पर लगा है। पेंसिल से। थोड़ा फटा हुआ। ऊपर लिखा है — “Ice Stupa, Jan 2013।”
पास में एक छोटा सा नोट है।
“Imagine first. Engineer later.”
पहले कल्पना करो। इंजीनियरिंग बाद में।