शाप के बाद की पहली रात थी।
चंद्रमा आकाश में ठीक उसी जगह खड़े थे जहाँ हमेशा खड़े होते थे — कैलाश के ऊपर, बादलों से थोड़ा परे, जहाँ से पूरी पृथ्वी एक नीली थाली की तरह दिखती है। पर आज पहली बार उन्होंने अपनी ही रोशनी देखी और शर्म से नज़र झुका ली।
कुछ घंटे पहले गणेश जी के सामने हँसी छूट गई थी। एक छोटे से बच्चे को गिरते देखकर। मूषक से उतरते वक्त उनका भारी पेट हिला, और चंद्रमा हँस पड़े थे — ऊँचे आसमान से, सबके सामने।
गणेश जी ने ऊपर देखा। बस इतना ही कहा था —
“तुम्हें अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड है, चंद्र। आज से कोई तुम्हें देखना नहीं चाहेगा। जो भी मेरे जन्मदिन पर तुम्हें देखेगा, उस पर मिथ्या कलंक लगेगा।”
और चले गए थे।
अब रात के तीसरे प्रहर में चंद्रमा अकेले थे। नीचे पृथ्वी पर लोग सो रहे थे, पर जो जागे हुए थे — प्रेमी, यात्री, मछुआरे — सब आज उनसे मुँह फेर रहे थे। एक स्त्री ने खिड़की बंद कर दी। एक बूढ़े आदमी ने अपनी छत से उतर कर अंदर जाना ज़रूरी समझा। एक बच्चा जो हमेशा उन्हें देखकर हाथ हिलाता था, आज माँ की गोद में मुँह छुपाए सो गया।
चंद्रमा को लगा कि उनकी रोशनी कहीं भीतर से ठंडी पड़ गई है।
कितने महीने बीते, यह उन्हें भी ठीक से याद नहीं।
समय आकाश में अलग चलता है। पर एक रात वो हिमालय के ऊपर से गुज़र रहे थे — धीरे-धीरे, जैसे कोई चोर अपने ही घर में चलता है — और नीचे एक छोटे से गाँव में एक झोपड़ी के बाहर दीया जल रहा था।
उन्होंने रुक कर देखा।
एक औरत बैठी थी। उसका बच्चा बीमार था। बहुत छोटा बच्चा, शायद दो साल का। बुख़ार था उसे, और साँस तेज़ चल रही थी। औरत के पास दवा नहीं थी। पति शहर गया था काम के लिए, अभी लौटा नहीं था।
औरत ने ऊपर देखा।
चंद्रमा ने तुरंत बादल के पीछे जाने की कोशिश की — कलंक का डर था। पर औरत ने हाथ जोड़ दिए।
“चाँद भैया,” उसने धीरे से कहा, “बेटे को देख लो एक बार। बस रोशनी थोड़ी और कर दो। मुझे काढ़ा बनाना है, अंधेरे में जड़ी-बूटी नहीं दिख रही।”
चंद्रमा ठहर गए।
पहली बार किसी ने उनसे शाप के बाद बात की थी। पहली बार किसी ने उन्हें भैया कहा था।
उन्होंने धीरे से अपनी रोशनी थोड़ी बढ़ाई — डरते-डरते, जैसे कोई बहुत दिनों बाद किसी से मिलने जा रहा हो। ज़मीन पर एक पीली सी चादर बिछ गई। औरत ने जड़ी-बूटी ढूंढ ली। काढ़ा बनाया। बच्चे को पिलाया।
कुछ देर बाद बच्चे की साँस सहज हो गई।
औरत ने फिर ऊपर देखा और मुस्कुराई — बहुत थकी हुई मुस्कान — और कहा, “शुक्रिया।”
चंद्रमा ने उस रात पहली बार समझा कि रोशनी देने का मतलब क्या होता है। पहले जब वो चमकते थे, तो सोचते थे लोग उन्हें देखकर सुंदर लगते हैं। आज पता चला कि वो लोगों को रास्ता दिखाते हैं। ये दो बहुत अलग बातें हैं।
एक और रात आई।
समंदर के ऊपर से वो गुज़र रहे थे। नीचे एक नाव। एक मछुआरा, अकेला, जाल खींच रहा था। उसकी आँखें थकी हुई थीं। तीन रात से वो घर नहीं गया था।
मछुआरे ने ऊपर देखा।
चंद्रमा फिर सिकुड़े। पर मछुआरे ने हाथ नहीं जोड़े। उसने कुछ कहा भी नहीं। बस देखा। और देखता रहा।
चंद्रमा को लगा कि शायद ये आदमी उन्हें कोस रहा है मन ही मन। शायद इसे कोई कलंक लगा होगा। शायद इसकी पत्नी ने इस पर शक किया होगा क्योंकि एक रात इसने चाँद देख लिया था।
पर मछुआरा बस देख रहा था। और फिर बहुत धीरे से, अपने आप से बोला —
“तू भी अकेला है क्या आज?”
चंद्रमा के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
मछुआरा हँसा। अकेले हँसने वाली हँसी। फिर जाल खींचता रहा।
उस रात चंद्रमा ने जाना कि अकेलापन क्या होता है — और ये भी जाना कि अकेलापन सिर्फ उन्हीं को नहीं होता जो आसमान में होते हैं। नीचे, ज़मीन पर, समंदर में, हर जगह कोई न कोई अकेला है। पहले उन्होंने कभी ये नहीं देखा था। पहले वो सिर्फ अपनी रोशनी देखते थे।
सालों बीते।
चंद्रमा अब पहले जैसे नहीं रहे। उन्होंने सीख लिया था कि कैसे धीरे चलना है। कैसे बादलों के पीछे रुकना है जब किसी को दर्द हो। कैसे थोड़ी रोशनी देनी है उन माओं के लिए जिनके बच्चे रात में रोते हैं। कैसे चुप रहना है जब कोई प्रेमी अपने प्रेम से मिल नहीं पाया।
वो अब चमकते नहीं थे। वो साथ देते थे।
एक दिन वो ब्रह्मा जी के पास गए।
“पितामह,” उन्होंने कहा, “मुझे क्षमा मांगनी है। पर मैं उनके पास जाने से डरता हूँ।”
ब्रह्मा जी मुस्कुराए। “जा। अब जा सकता है।”
“कैसे जानते हैं आप?”
“क्योंकि अब तू वो चंद्रमा नहीं है जो हँसा था। तू कोई और है।”
चंद्रमा गणेश जी के पास गए। बहुत डरे हुए। बहुत झुके हुए।
गणेश जी ने उन्हें देखा। बहुत देर तक देखा। फिर बोले —
“तू बदल गया है।”
“हाँ, प्रभु।”
“तूने क्या सीखा?”
चंद्रमा कुछ देर चुप रहे। फिर बोले —
“मैंने सीखा कि सुंदरता और उपयोगिता एक चीज़ नहीं हैं। मैंने सीखा कि जब कोई आपको देखना नहीं चाहता, तो आपको दिखने की कोशिश छोड़ देनी चाहिए — और फिर भी रोशनी देते रहना चाहिए। मैंने सीखा कि घमंड हँसी की तरह आता है — बिना सोचे, बिना तौले। और बहुत महंगा पड़ता है।”
गणेश जी ने सिर हिलाया।
“शाप पूरा नहीं हटेगा, चंद्र। मेरे जन्मदिन की रात लोग तुझे फिर भी न देखें — ये नियम बना रहेगा। पर अब तू दोषी नहीं है। अब वो उनकी सावधानी है, तेरी सज़ा नहीं।”
चंद्रमा ने सिर झुकाया।
“और एक बात,” गणेश जी ने जोड़ा। “तू अब बढ़ता और घटता रहेगा। हर महीने। ये याद रखने के लिए कि कोई हमेशा एक जैसा नहीं रहता। तू भी नहीं। और कोई भी नहीं।”
आज भी, हर साल, भाद्रपद की चतुर्थी की रात लोग चाँद नहीं देखते।
पर अगर कभी आप उस रात बहुत ज़रूरत में हों — बहुत अकेले, या बहुत दुखी, या बहुत डरे हुए — और गलती से ऊपर देख लें — तो चंद्रमा बुरा नहीं मानते। वो जानते हैं कि कुछ नज़रें कलंक नहीं होतीं। कुछ नज़रें बस ज़रूरत होती हैं।
और रोशनी देना, उन्होंने बहुत साल पहले सीख लिया था, माँगने वाले की हालत देखकर तय नहीं होता।
बस होता है।
जैसे साँस होती है।