रात के तीसरे पहर में राजा विक्रमादित्य ने अपना मुकुट उतारा, अपनी अंगूठियाँ उतारीं, और एक फटी हुई चादर ओढ़ ली जो किसी मरे हुए साधु की थी।
उसके मंत्री ने पूछा था — “महाराज, इस बार किस बहाने से जा रहे हैं?”
राजा ने जवाब नहीं दिया था। क्योंकि सच्चा जवाब अजीब था — मैं ऊब गया हूँ। मैंने जीत देखी, हार देखी, प्रेम देखा, छल देखा। अब कुछ ऐसा देखना चाहता हूँ जो मुझे फिर से चौंका दे।
उज्जयिनी की गलियाँ रात में अलग दिखती थीं। दीये बुझ चुके थे। बस कहीं-कहीं कुत्ते भौंक रहे थे और कहीं-कहीं कोई बच्चा रो रहा था जिसे माँ चुप कराने की कोशिश कर रही थी।
राजा को तीन भिखारी ढूँढने थे। तीन — क्योंकि एक से धोखा हो सकता था, दो में संयोग, पर तीन में सच्चाई थी। यही उसका नियम था।
पहला भिखारी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा था। नाम था भोला। उम्र पचास के आसपास। एक टाँग नहीं थी।
राजा उसके पास बैठ गया।
“भाई,” राजा ने कहा, “मैं एक यात्री हूँ। मेरे पास एक अजीब चीज़ है। मैं तुम्हें वो दे सकता हूँ जो तुम्हारे जीवन में नहीं है। पर तुम्हें खुद बताना होगा कि वो क्या है।”
भोला हँसा। उसकी हँसी में कोई कड़वाहट नहीं थी — बस थकान थी।
“भाई, तू पागल है या मुझे पागल समझ रहा है?”
“न पागल हूँ, न समझ रहा हूँ। एक बार सोचकर बता।”
भोला ने आसमान की तरफ देखा। फिर अपनी कटी हुई टाँग की तरफ। फिर मंदिर के बंद दरवाज़े की तरफ।
“एक चीज़ चाहिए मुझे।”
“क्या?”
“मेरी बेटी की शादी की रात उसके ससुर ने उसे लौटा दिया था। कहा था — बाप लंगड़ा है, घर में भीख माँगता है, हम ऐसे घर से रिश्ता नहीं रख सकते। मेरी बेटी उस रात से मुझसे बात नहीं करती। दस साल हो गए।”
भोला रुका।
“तू मुझे ये दे सकता है कि वो एक बार — सिर्फ एक बार — मेरे पास आए और कहे, बापू, मुझे माफ़ कर दो? मुझे माफ़ नहीं चाहिए। बस उसका मुँह देखना है। उसकी आवाज़ सुननी है।”
राजा कुछ देर चुप रहा।
“भोला,” उसने धीरे से कहा, “तू वो माँग रहा है जो मुझसे नहीं हो सकता।”
“तो फिर तू झूठा है।”
“नहीं। मैं सच्चा हूँ। पर तू जो माँग रहा है — वो किसी राजा से भी नहीं हो सकता। किसी देवता से भी नहीं।”
भोला ने सिर हिलाया। “तब चला जा, भाई। और मुझे झूठी उम्मीद मत दे।”
राजा उठा। चलते-चलते रुका। “भोला, अगर तेरी बेटी आज रात आ जाए — तो तू उससे क्या कहेगा?”
भोला ने राजा की तरफ देखा। आँखों में पानी आ गया।
“कुछ नहीं कहूँगा। बस उसका हाथ पकड़कर बैठ जाऊँगा।”
दूसरा भिखारी बावड़ी के पास मिला। नाम था कमरुद्दीन। नौजवान था, शायद पच्चीस का। आँखें तेज़ थीं — भीख माँगने वाली आँखें नहीं, कुछ और थीं।
राजा ने वही प्रस्ताव रखा।
कमरुद्दीन कुछ देर चुप रहा। फिर बोला — “एक शर्त पर।”
“बता।”
“पहले तू बता, तू कौन है। चेहरे से तू भिखारी नहीं है। तेरी चादर पुरानी है पर हाथ पुराने नहीं। तेरी आवाज़ में हुक्म है। तू कौन है?”
राजा हँसा। पहली बार उस रात।
“फर्क पड़ता है?”
“पड़ता है। अगर तू अमीर है, तो तू मेरा मज़ाक उड़ा रहा है। अगर तू किसी का जासूस है, तो तू मुझे फँसा रहा है। अगर तू देवदूत है, तो मैं तेरे पैरों पर गिर जाऊँगा।”
“मान ले मैं इन तीनों में से कोई नहीं हूँ।”
“फिर तो तू मुझसे भी ज़्यादा गरीब है। क्योंकि जिसके पास सच नहीं, उसके पास कुछ नहीं।”
राजा को ये बात लगी। बहुत अंदर तक लगी। पर उसने चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया।
“अच्छा, कमरुद्दीन। मान ले मैं देवदूत हूँ। तू क्या माँगेगा?”
कमरुद्दीन ने ज़ोर से साँस ली।
“मैं कुछ नहीं माँगूँगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो मुझे चाहिए, वो माँगने से नहीं मिलता। मुझे इज़्ज़त चाहिए। मैं इस शहर में पैदा हुआ। मेरा बाप दर्ज़ी था। माँ खाना पकाती थी अमीरों के घरों में। मैं पढ़ा हूँ। फ़ारसी जानता हूँ। हिसाब जानता हूँ। पर इस शहर ने मुझे काम नहीं दिया क्योंकि मेरा नाम कमरुद्दीन है और बाप दर्ज़ी था।”
“तो तू भीख क्यों माँगता है?”
“भीख नहीं माँगता। बैठा रहता हूँ। लोग कुछ रख जाते हैं तो रख लेता हूँ। मैं किसी से कुछ नहीं माँगता।”
“और तू मुझसे भी कुछ नहीं माँगेगा?”
“नहीं। क्योंकि अगर तूने मुझे इज़्ज़त दी, तो वो इज़्ज़त नहीं रहेगी। इज़्ज़त वो चीज़ है जो दी नहीं जाती। जो खुद आती है — या नहीं आती।”
राजा बहुत देर तक बावड़ी की मुंडेर पकड़े खड़ा रहा।
“कमरुद्दीन, अगर मैं तुझे कल काम दूँ — दरबार में, हिसाब का काम — तो तू लेगा?”
“अगर वो काम मुझे मेरी काबिलियत के लिए मिले, तो लूँगा। अगर तेरी दया के लिए मिले, तो लात मारूँगा।”
राजा ने सिर झुकाया। चलते-चलते उसने जेब से एक चाँदी का सिक्का निकाला।
कमरुद्दीन ने हाथ उठाया — “रख वापस। मैंने कहा था ना — कुछ नहीं माँगा।”
तीसरा भिखारी सबसे अजीब था। नदी के किनारे, एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे। बहुत बूढ़ा। शायद अस्सी का। अंधा।
राजा बैठा।
“बाबा।”
“बैठ, बेटा। तू कब से चल रहा है?”
राजा चौंका। “तुझे कैसे पता?”
“तेरी साँस से। तू बहुत थक गया है। पानी पिएगा?”
बूढ़े ने अपने पास रखा एक मिट्टी का घड़ा बढ़ाया। राजा ने पानी पिया। पानी ठंडा था। उसने सोचा कि पिछली बार उसने ऐसा पानी कब पिया था — और याद नहीं आया।
“बाबा, मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ।”
“क्या?”
“जो तुम्हारे जीवन में नहीं है। पर तुम्हें खुद बताना होगा कि वो क्या है।”
बूढ़े ने मुस्कराकर पूछा — “बेटा, तू कौन है?”
“एक यात्री।”
“नहीं। तू कौन है, सच में?”
राजा कुछ देर चुप रहा।
“मैं… मैं ऐसा आदमी हूँ जिसके पास सब कुछ है पर कुछ भी नहीं लगता।”
बूढ़े ने सिर हिलाया।
“समझा। तू वो आदमी है जो हमेशा से डर रहा है कि तेरा जीवन व्यर्थ है, और तू ये साबित करने निकलता है कि नहीं है।”
राजा को लगा कोई उसके सीने पर बैठ गया है।
“बाबा… तुम्हें मेरी कहानी कैसे…”
“तेरी कहानी मेरी कहानी है, बेटा। मैं भी कभी कुछ था। राजमहल नहीं था मेरा, पर एक छोटी सी ज़मीन थी। बीवी थी। दो बच्चे थे। ज़मीन गई, बीवी गई, बच्चे गए। आँखें भी गईं। एक दिन सब चला गया।”
“तो… तो तुम्हें क्या चाहिए, बाबा?”
बूढ़ा हँसा। उसकी हँसी में कुछ ऐसा था जो राजा ने पहले कभी नहीं सुना था — खुशी, पर बिना किसी कारण के।
“बेटा, तू मुझे क्या देगा? आँखें? वो अब नहीं चाहिए — मैं अब चीज़ों को बेहतर सुन सकता हूँ। बच्चे? वो अब इस उम्र में मेरा बोझ बनेंगे। ज़मीन? मैं अब चल नहीं सकता, बोऊँगा क्या?”
“फिर भी कुछ तो होगा।”
बूढ़ा कुछ देर चुप रहा।
“एक चीज़ है, बेटा। पर वो तू नहीं दे सकता।”
“क्या?”
“मेरे जीवन में अब सिर्फ एक चीज़ नहीं है — और वो है चाहना। मुझे अब कुछ नहीं चाहिए। ये अच्छा भी है, बुरा भी। अच्छा इसलिए कि मैं शांत हूँ। बुरा इसलिए कि जब किसी को कुछ नहीं चाहिए, तो वो जीवित नहीं रहता — बस साँस लेता है। मुझे चाहत चाहिए, बेटा। एक छोटी सी चाहत। कुछ भी। पर वो माँगने से नहीं आती।”
राजा को लगा वो बहुत छोटा हो गया है। बहुत छोटा।
“बाबा… ये जो तुम्हारी हालत है — कि तुम्हें कुछ नहीं चाहिए — ये बीमारी है?”
“नहीं बेटा। ये अंत है। जब आदमी को कुछ चाहना बंद हो जाता है, तो वो मर चुका होता है। बस उसका शरीर बाद में मरता है।”
बूढ़े ने राजा का हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ कमज़ोर थी पर गर्म थी।
“तू अभी जवान है, बेटा। तू अभी मरा नहीं है। तू अभी ऊब गया है, बस। ऊब बीमारी नहीं — ऊब निशानी है कि अभी कुछ बाकी है, और तुझे वो मिला नहीं है। ढूँढ। मत रुक।”
राजा जब महल पहुँचा, तब सुबह हो रही थी।
उसने मंत्री को बुलाया।
“तीन काम।”
मंत्री ने सिर झुकाया।
“पहला — मंदिर की सीढ़ियों पर एक भिखारी है, भोला। उसकी बेटी का नाम पता करो। उसे बिना मेरे नाम के एक संदेश भेजो — कि उसका पिता बीमार है, उसे एक बार मिलने आ जाए। बस इतना। बाकी उन दोनों के बीच की बात है।”
“जी, महाराज।”
“दूसरा — बावड़ी के पास एक नौजवान है, कमरुद्दीन। हिसाब का इम्तिहान लो उसका। अगर पास हो, तो दरबार में रखो। बिना ये बताए कि मैंने भेजा है। अगर वो पूछे कि किसने भेजा, तो कहना — तेरी काबिलियत ने।”
“जी।”
“तीसरा…”
राजा रुका।
“तीसरा क्या, महाराज?”
राजा ने खिड़की से बाहर देखा। नदी के किनारे का पीपल का पेड़ यहाँ से नहीं दिखता था। पर उसे पता था वो वहीं है।
“तीसरा — पीपल के पेड़ के नीचे एक बूढ़ा बैठा है। उसके लिए कुछ मत करो।”
“कुछ नहीं?”
“नहीं। बस… मेरे लिए एक काम करो।”
“क्या, महाराज?”
राजा ने एक लंबी साँस ली।
“मेरे लिए एक छोटा सा बगीचा बनवाओ। महल के पीछे। फूलों का। मैं… मैं रोज़ सुबह उसमें काम करना चाहता हूँ। अपने हाथों से। मिट्टी छूना चाहता हूँ। मुझे एक छोटी सी चाहत चाहिए। कुछ ऐसा जो मेरा हो — मेरे राज्य का नहीं, मेरे नाम का नहीं। बस मेरा।”
मंत्री ने राजा को देखा। कई बरसों में पहली बार राजा की आँखों में कुछ था जो वहाँ पहले नहीं था।
मंत्री ने सिर झुकाया और कमरे से बाहर निकल गया।
राजा खिड़की पर खड़ा रहा।
उसने तीनों भिखारियों को इम्तिहान देने के लिए बुलाया था। पर इम्तिहान किसका हुआ — ये अब उसे साफ़ था।
भोला ने उसे सिखाया कि कुछ चाहतें इतनी बड़ी होती हैं कि कोई राजा, कोई देवता उन्हें पूरा नहीं कर सकता — और फिर भी वो चाहतें इंसान को ज़िंदा रखती हैं।
कमरुद्दीन ने उसे सिखाया कि जो चीज़ें दी जाती हैं, वो चीज़ें असली नहीं होतीं। असली चीज़ें कमाई जाती हैं।
और बूढ़े ने उसे वो सिखाया जो सबसे डरावनी बात थी — कि एक दिन ऐसा भी आता है जब आदमी के पास सब कुछ होता है, पर चाहत नहीं बचती। और उस दिन वो मर जाता है, चाहे साँस चलती रहे।
राजा भिखारियों की दुनिया में गया था ये देखने कि वो उससे क्या माँगते हैं। पर लौटा ये जानकर — कि वो खुद, अपने महल में, उनसे ज़्यादा गरीब था। उनके पास चाहतें थीं। उसके पास सब था, बस चाहत नहीं थी।
और चाहत — बूढ़े ने ठीक कहा था — माँगने से नहीं आती।
वो खुद उगानी पड़ती है। बीज की तरह। मिट्टी में। हाथों से।
राजा अपने कमरे से निकला और सीधे महल के पिछवाड़े गया, जहाँ अभी कोई बगीचा नहीं था — सिर्फ़ बंजर ज़मीन थी। उसने झुककर एक मुट्ठी मिट्टी उठाई।
मिट्टी ठंडी थी। उसकी हथेली में अजीब लगी। पर अच्छी लगी।
बहुत सालों बाद उसे लगा कि शायद आज वो जीवित है।