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एक माँ का म्यूचुअल फंड

Rajhussain · 05-June-2026 4 मिनट में पढ़ें
एक माँ का म्यूचुअल फंड

✨ Angle: यह कहानी पैसे बचाने की नहीं है — यह उस माँ की है जिसने एक सपने में निवेश किया, और अंत में उस सपने ने ही खुद को बदल लिया।


रंजना देवी को नहीं पता था कि SIP क्या होता है।

उन्हें बस इतना पता था कि बैंक वाले भैया ने कहा था — “दो हजार हर महीने। चौदह साल बाद, जब बेटी की उम्र हो जाए, तो शादी का खर्चा निकल आएगा।”

यह जनवरी 2010 था। कानपुर से पचास किलोमीटर दूर, उन्नाव जिले के एक कस्बे में, रंजना की सिलाई की दुकान एक कमरे में चलती थी। सुबह आठ से रात नौ बजे तक। ब्लाउज, पेटीकोट, सलवार-कमीज। हाथ चलते रहते, आँखें थकती रहतीं।

उनके पति सुरेश जी ट्रक चलाते थे। घर पर कम रहते थे।

बेटी प्रिया चार साल की थी। घुटनों पर बैठकर कपड़ों के टुकड़े जोड़ती थी — माँ की नकल।

रंजना ने उस दिन दो हजार रुपए निकाले, फॉर्म पर अँगूठा लगाया, और घर आ गईं।


2013 — जब बाज़ार गिरा

अगस्त में एक सुबह रंजना के मोबाइल पर मैसेज आया।

“Your NAV has fallen by 18%.”

उन्होंने मैसेज दो बार पढ़ा। फिर बैंक वाले भैया को फोन किया।

“भैया, पैसे डूब गए क्या?”

“नहीं भाभी जी, बाज़ार नीचे गया है। कुछ दिन रुकिए।”

“रुकना है या निकालना है?”

“रुकिए।”

रंजना ने मोबाइल रखा। दो मिनट सोचती रहीं। फिर सिलाई मशीन चालू की।

उस महीने का दो हजार उन्होंने भेज दिया।

अगले महीने भी।


2016 — बढ़ाना पड़ेगा

सुरेश जी को लिवर की बीमारी हुई। पहले लखनऊ, फिर कानपुर। अस्पताल के चक्कर। काम कम होता गया।

इन्हीं दिनों रंजना के यहाँ एक नया ऑर्डर आया — पास के गाँव की एक नेत्री के लिए पाँच दर्जन ब्लाउज। तीन हफ्ते लगे। दो हजार पाँच सौ रुपए मिले एकमुश्त।

रंजना ने वो पैसे जोड़कर SIP तीन हजार कर दी।

बैंक वाले भैया ने पूछा, “इस मुश्किल में बढ़ा रही हैं?”

“हाँ,” उन्होंने कहा। “मुश्किल में ही तो बढ़ाना होता है।”


2020 — अकेले

मार्च में लॉकडाउन लगा।

अप्रैल में सुरेश जी नहीं रहे।

रंजना ने दोनों ख़बरें एक ही हफ्ते में पचाईं।

पंद्रह दिन के बाद उन्होंने सिलाई मशीन फिर चालू की। घर में ऑर्डर आने लगे। दिन में पड़ोसन के मास्क। रात को पुराने कपड़े रिपेयर।

मई में उन्होंने बैंक का मैसेज देखा।

फंड की वैल्यू उस साल फिर गिरी थी।

रंजना ने सोचा — अगर मैं यहाँ नहीं रुकी, तो कहाँ रुकूँगी?

तीन हजार का SIP चलता रहा।

प्रिया, अब चौदह साल की, माँ के पास बैठकर सिलाई सीखने लगी।


2024 — ग्यारह लाख चालीस हजार

अप्रैल में एक मैसेज आया।

“Current Value: ₹11,43,820”

रंजना ने वो मैसेज तीन बार पढ़ा।

फिर प्रिया को आवाज़ लगाई।

“प्रिया, इधर आ।”

दोनों साथ बैठ गईं। रंजना ने मोबाइल आगे किया।

“देख। ये तेरी शादी के पैसे हैं।”

प्रिया ने स्क्रीन देखी। लंबी चुप्पी।

“मम्मी।”

“हाँ।”

“मुझे शादी नहीं करनी। मुझे पढ़ाई करनी है।”


रंजना ने मोबाइल उसके हाथ से नहीं लिया।

उन्होंने बस एक बार प्रिया की तरफ देखा — वही आँखें, जो चार साल की उम्र में कपड़ों के टुकड़े जोड़ती थीं।

“कितने साल का कोर्स है?” उन्होंने पूछा।

“तीन साल। B.Sc Nursing।”

रंजना ने मोबाइल अपने पास लिया। एक मिनट सोचती रहीं। फिर बोलीं, “चल, बैंक चलते हैं।”

“किसलिए?”

“SIP तोड़नी नहीं है। तीन साल और चलेगी।”

प्रिया समझ नहीं पाई।

“मम्मी, पैसे तो—”

“पैसे हैं। लेकिन जब तू नर्स बनेगी, तो एक घर भी चाहिए। तब काम आएंगे ये।”


वो दोनों शाम को बैंक से लौटीं। रंजना की सिलाई मशीन बंद थी — पहली बार कई सालों में, बिना किसी बीमारी के।

रंजना ने चाय बनाई।

प्रिया ने पूछा, “मम्मी, तुम्हें बुरा नहीं लगा?”

“किस बात का?”

“कि मैंने… वो सब नहीं माना जो तुमने सोचा था।”

रंजना ने चाय का कप रखा।

“मैंने सोचा था तू खुश रहे। तू खुश है?”

“हाँ।”

“तो मैंने जो सोचा था, वही हुआ।”


2010 से 2024 तक, रंजना देवी ने कुल ₹3,96,000 जमा किए थे। फंड की वैल्यू: ₹11,43,820। रिटर्न: लगभग 12% प्रति वर्ष — बाज़ार के उतार-चढ़ाव के बावजूद।

लेकिन उन्होंने जो असली निवेश किया था, वो इन संख्याओं में नहीं था।

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