समुद्र की लहरें उस रात कुछ ज़्यादा ही तेज़ थीं, जैसे उन्हें पहले से पता हो कि आज कुछ टूटने वाला है। विभीषण अपने महल की छत पर खड़े थे, हाथ में वही स्वर्ण-कंगन जो पुलत्स्य ऋषि ने कभी उन्हें आशीर्वाद के साथ पहनाया था। नीचे लंका जगमगा रही थी — सोने के परकोटे, जलते दीप, पहरेदारों की परछाइयाँ। यह उनका घर था। और आज रात, शायद आख़िरी बार, वह इसे अपना कह पा रहे थे।
रावण के दरबार से अभी-अभी लौटे थे वह। कानों में अब भी वही शब्द गूँज रहे थे — “देशद्रोही”, “कायर”, “मेरे ही खून का दुश्मन।” विभीषण ने कुछ नहीं कहा था तब। बस इतना पूछा था, धीरे से, जैसे कोई बच्चा किसी बड़े से आख़िरी बार समझाइश माँगता है — “अग्रज, सीता माँ को लौटा दीजिए। युद्ध टल जाएगा।” जवाब में रावण के पैर की एक लात पड़ी थी, सीधे उस छाती पर जो कभी उसी रावण की गोद में सोई थी।
वो रात जब विभीषण ने लंका छोड़ी
चोट शरीर पर नहीं थी। चोट कहीं और लगी थी — उस जगह, जहाँ चालीस साल का बड़ा भाई अब भी छोटे भाई की आँखों में एक बच्चे को ही देखता है, उसकी बात को सुनने लायक भी नहीं समझता।
विभीषण की पत्नी सरमा दरवाज़े पर खड़ी थीं, चुप। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस इतना कहा, “तुम जानते हो तुम्हें क्या करना है। मैं सिर्फ़ यह जानना चाहती हूँ — क्या तुमने अपने भीतर यह फ़ैसला आज किया, या यह बरसों से तुम्हारे भीतर पका हुआ पड़ा था?”
विभीषण ने जवाब नहीं दिया। लेकिन उस रात, जब वह चार अनुचरों के साथ अपने राजमहल की सीढ़ियाँ उतरे और समुद्र की तरफ़ चले, तो हर कदम पर उन्हें अपना ही बचपन याद आया। रावण उन्हें कंधे पर बिठाकर कैलाश की कहानियाँ सुनाता था। रावण ने ही उन्हें पहली बार शिव-स्तुति सिखाई थी। और अब वही रावण, सत्ता के नशे में, एक स्त्री को बंदी बनाए बैठा था, और अपने ही भाई को गद्दार कह रहा था क्योंकि वह भाई सच बोल रहा था।
धर्म और रक्त — विभीषण की कहानी दरअसल यहीं से शुरू होती है, इसी एक रात से, जब यह दोनों शब्द पहली बार आमने-सामने खड़े हुए और एक को चुनना पड़ा।
समुद्र के उस पार, जहाँ कोई पहचानता नहीं था
समुद्र तट पर हवा नमकीन और भारी थी। विभीषण वहाँ पहुँचे तो सामने वानर-सेना की भीड़ थी — हज़ारों आँखें, जो उन्हें शक की नज़र से देख रही थीं। एक लंकावासी, वह भी रावण का सगा भाई, अचानक उनकी सेना में आ खड़ा हो? सुग्रीव ने तुरंत कहा — “यह चाल हो सकती है, प्रभु। रावण का भेजा हुआ जासूस।”
राम चुप रहे। उन्होंने विभीषण की आँखों में देखा — सीधे, बिना किसी हिचक के। वहाँ कोई छल नहीं था, सिर्फ़ थकान थी। एक आदमी की थकान, जो बहुत दिनों से सही और ग़लत के बीच अकेला खड़ा लड़ता रहा हो।
“मैं शरण में आया हूँ,” विभीषण ने कहा। आवाज़ काँप रही थी, लेकिन शब्द नहीं डगमगाए। “मेरे पास खोने को अब कुछ नहीं बचा — न राज्य, न भाई, न घर। बस यह जानना है कि जो सच मैंने वहाँ कहा, वह यहाँ भी सुना जाएगा या नहीं।”
राम मुस्कुराए। एक हल्की, गहरी मुस्कान। “जो शरण में आता है, चाहे वह जो भी हो, मैं उसे नहीं लौटाता।” फिर उन्होंने समुद्र का जल मँगवाया और वहीं, उस भीड़ के सामने, विभीषण को लंका के भावी राजा के रूप में अभिषिक्त कर दिया — एक ऐसे राज्य का राजा, जिस पर अभी युद्ध भी नहीं हुआ था।
यह क्षण भर के लिए हास्यास्पद लग सकता था। एक राज्य जो अभी जीता ही नहीं गया, और उसका राजा घोषित हो रहा है समुद्र किनारे रेत पर बैठकर। लेकिन विभीषण समझ गए — राम उन्हें राज्य नहीं दे रहे थे। राम उन्हें बता रहे थे कि सच बोलने की कीमत सिर्फ़ खोना नहीं होती, कभी-कभी वह कुछ और भी देती है, जिसे उस वक़्त देखना मुश्किल होता है।
युद्धभूमि में, अपने ही महल की तरफ़ तीर तानते हुए
युद्ध शुरू हुआ तो विभीषण को सबसे कठिन काम मिला — लंका की उन गलियों का नक्शा बताना, जिनमें वह बचपन में खेले थे। कुम्भकर्ण के सोने का समय, इंद्रजीत के यज्ञ-स्थल की कमज़ोरी, रावण की उस शक्ति का भेद जो अमरता जैसी लगती थी।
हर जानकारी देते वक़्त कुछ अंदर टूटता था। यह गद्दारी नहीं थी — विभीषण ख़ुद से यह बार-बार दोहराते — यह उस झूठ को तोड़ना था जिसमें पूरी लंका डूबी हुई थी, यह मानकर कि ग़लत काम भी अगर अपना भाई करे, तो सही हो जाता है।
जब कुम्भकर्ण मारा गया, विभीषण की आँखों में आँसू थे। जब इंद्रजीत गिरा, विभीषण चुपचाप एक तरफ़ बैठ गए, बहुत देर तक कुछ नहीं बोले। और जब आख़िरकार रावण गिरा — वह भाई जिसने कभी उन्हें कंधे पर बिठाया था — विभीषण दौड़कर उसके शव के पास पहुँचे, और वहाँ खड़े हर वानर और हर मनुष्य ने एक अजीब दृश्य देखा: लंका के अगले राजा, अपने मरे हुए शत्रु के शरीर पर सिर रखकर रो रहे थे, जैसे कोई साधारण छोटा भाई रोता है।
जब जीत के बाद भी कुछ जीता हुआ नहीं लगा
राम ने विभीषण से कहा, “अपने भाई का अंतिम संस्कार करो। वह मेरा शत्रु था, तुम्हारा नहीं। तुम्हारे लिए वह अब भी बड़ा भाई है।”
यह एक पंक्ति थी, लेकिन इसी में विभीषण की पूरी कहानी का सार छिपा था — कि धर्म को चुनना रिश्ते को मिटा देना नहीं होता। विभीषण ने चंदन की चिता सजाई, वैदिक मंत्र पढ़े, अपने हाथों से आग दी। जिस भाई ने उन्हें “देशद्रोही” कहा था, उसी भाई को राजोचित सम्मान के साथ विदा किया — क्योंकि सही होना और प्रेम करना, विभीषण के लिए, कभी दो अलग बातें नहीं थीं।
राज्याभिषेक के दिन, जब स्वर्ण सिंहासन पर विभीषण बैठे, तो उनकी नज़र भीड़ में कहीं दूर टिकी रही — शायद उस बालकनी की तरफ़, जहाँ से एक रात वह चुपचाप उतरे थे, स्वर्ण-कंगन हाथ में लिए। ताज सिर पर था, पर चेहरे पर जीत का कोई उल्लास नहीं था। सिर्फ़ एक शांत, थका हुआ सुकून — जैसे बरसों बाद किसी ने आख़िरकार साँस ली हो।
इस कथा से जुड़े सवाल
विभीषण ने रावण को छोड़कर राम की शरण क्यों ली? विभीषण ने बार-बार रावण को सीता को लौटाने और अधर्म का रास्ता छोड़ने के लिए समझाया था, पर रावण ने उन्हें अपमानित कर दरबार से निकाल दिया। इसके बाद विभीषण ने धर्म को अपने भाई से ऊपर रखा और राम की शरण में चले गए।
क्या विभीषण को गद्दार माना जाता है? लंका में उस समय कई लोगों ने उन्हें गद्दार कहा, पर हिंदू परंपरा में विभीषण को धर्म-निष्ठा और सत्य के पक्ष में खड़े रहने के प्रतीक के रूप में सम्मान दिया जाता है, गद्दारी के लिए नहीं।
रावण की मृत्यु के बाद विभीषण ने क्या किया? विभीषण ने अपने भाई रावण का पूरे राजोचित सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया, इससे पहले कि वह स्वयं लंका के राजा के रूप में राज्याभिषेक स्वीकार करते।
