समुद्र के ऊपर हवा में कोई दीवार नहीं थी, फिर भी हनुमान को रुकना पड़ा।
महेंद्र पर्वत से छलाँग लगाए अभी कुछ ही देर हुई थी। नीचे अनंत नीला पानी था, ऊपर खुला आकाश, और सामने सिर्फ़ एक लक्ष्य, लंका, जहाँ कहीं सीता माता थीं। थोड़ी देर पहले मैनाक पर्वत सागर से उठकर उन्हें विश्राम देने आया था। हनुमान ने उसे हाथ से छूकर आदर से लौटा दिया था। रामकाज पूरा होने तक रुकना उन्होंने सीखा ही नहीं था।
और अब यह।
आसमान में खड़ी वो विशाल छाया
लहरों के बीच से जैसे कोई पहाड़ उठा। फिर पहाड़ के ऊपर एक चेहरा बना, और चेहरे के बीच एक गुफ़ा खुल गई, इतनी गहरी कि उसमें बादल समा जाएँ।
“रुक जाओ, वानर।”
आवाज़ में समंदर की गड़गड़ाहट थी। यह सुरसा थीं, नागों की माता। देवताओं और ऋषियों ने ही उन्हें भेजा था, ताकि वे देखें कि यह वानर सचमुच इतनी बड़ी यात्रा के लायक है या नहीं। पर हनुमान को यह बात पता नहीं थी। उन्हें सिर्फ़ इतना दिख रहा था कि रास्ता बंद है।
“मुझे निगले बिना कोई नहीं जा सकता”
“देवताओं ने तुम्हें मेरा आहार ठहराया है,” सुरसा ने कहा। “मेरा वर है कि इस मार्ग से जो भी गुज़रे, वह मेरे मुँह में आए बिना आगे नहीं जा सकता। आओ, भीतर आओ।”
हनुमान ने हाथ जोड़ दिए। यह भी उनकी ताक़त का एक रूप था कि वे सबसे पहले झुकना जानते थे।
“माता, मैं श्रीराम के काम से निकला हूँ। उनकी पत्नी को खोजने जा रहा हूँ। मुझे जाने दीजिए। सीता माता का समाचार देकर मैं स्वयं लौटूँगा और आपके मुँह में आ जाऊँगा। यह मेरा वचन है।”
सुरसा नहीं मानीं। “वचन तुम्हारा है, वर मेरा है। मेरा वर आज और अभी पूरा होना है।”
पवनपुत्र एक पल को ठिठके। सामने एक माँ थी, जो अपने वचन से बँधी थी। पीछे एक राजा की आज्ञा थी, जिसके लिए वे अपने प्राण भी दे सकते थे। वे लड़ते तो जीत सकते थे, पर तब किसी एक का वचन टूट जाता। या सुरसा का, या उनका अपना।
उन्हें ऐसा रास्ता चाहिए था जिसमें दोनों वचन निभ जाएँ।
सौ योजन का खुला मुँह
“ठीक है माता,” हनुमान ने कहा। “तो मुझे निगल लीजिए।”
और वे बढ़ने लगे।
पहले दस योजन। सुरसा ने मुँह बीस योजन तक खोल दिया। हनुमान तीस योजन के हो गए, तो सुरसा चालीस पर पहुँचीं। पचास के सामने साठ। सत्तर के सामने अस्सी। आकाश में दो विराट आकृतियाँ थीं, एक बढ़ती हुई देह और एक फैलता हुआ जबड़ा।
हर बार सुरसा को पिछली बार से बड़ा खोलना पड़ता। और हर बार हनुमान चुपचाप कुछ गिन रहे थे। जबड़ा जितना खुलता जा रहा था, उसे बंद करने में उतना ही समय लगना था।
नब्बे योजन। फिर सौ।
सुरसा का मुँह अब इतना खुला था कि भीतर अँधेरे में तारे जैसी चमक दिखती थी। उनके जबड़े की नसें तन चुकी थीं। इस घड़ी वे दुनिया की सबसे बड़ी, और सबसे धीमी, चीज़ बन गई थीं।
अंगूठे जितना हनुमान
उसी क्षण हनुमान सिकुड़ गए।
इतनी तेज़ी से कि हवा को पता भी नहीं चला। विशाल पर्वत जैसा शरीर एक पल में अंगूठे के बराबर रह गया। वे सुरसा के खुले मुँह में बिजली की तरह घुसे और उतनी ही तेज़ी से बाहर निकल आए, इससे पहले कि जबड़ा हिल पाता।
अब वे फिर हवा में थे, हाथ जोड़े हुए।
“माता, प्रणाम। मैं आपके मुँह में प्रवेश कर चुका। आपका वर सत्य हुआ। अब आज्ञा दीजिए, मैं सीता जी की खोज में जाता हूँ।”
सुरसा का जबड़ा धीरे-धीरे बंद हुआ। कुछ पल वे कुछ नहीं बोलीं। फिर उनका वह भयानक रूप पिघल गया, और सामने एक शांत, मुस्कुराती माता खड़ी थीं।
“मैं तुम्हारी परीक्षा लेने आई थी, पुत्र,” उन्होंने कहा। “जो बड़ा होना जानता है और छोटा होना भी, उसे कोई मार्ग नहीं रोक सकता। जाओ। रामकाज सिद्ध करो।”
हनुमान और सुरसा की कहानी का असली मोड़
कहानी का सबसे सुंदर क्षण वह नहीं है जब हनुमान छोटे हुए। वह क्षण है जब उन्होंने तय किया कि किसी का वचन नहीं टूटेगा। न सुरसा का, न उनका।
उनके पास गदा थी, गति थी, पर्वत जितना शरीर था। फिर भी उन्होंने सबसे पहले रास्ता ढूँढा, लड़ाई बाद की बात थी। और ढूँढते-ढूँढते उन्होंने वह किया जो बल कभी नहीं करता, यानी अपने आप को छोटा कर लिया।
नीचे समुद्र में एक माँ बहुत देर तक आकाश के उस बिंदु को देखती रही, जो अब फिर पर्वत जितना बड़ा होकर लंका की ओर बढ़ रहा था।
इस कथा से जुड़े सवाल
सुरसा कौन थीं?
वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में सुरसा को नागों की माता कहा गया है। देवताओं के कहने पर वे समुद्र में हनुमान जी की परीक्षा लेने आई थीं।
हनुमान जी ने सुरसा के मुँह में जाने के लिए छोटा रूप क्यों लिया?
सुरसा का वर था कि कोई उनके मुँह में गए बिना आगे नहीं जा सकता। छोटा रूप लेकर हनुमान जी ने उनका वर भी पूरा कर दिया और अपना वचन भी, कि वे रामकाज के लिए जा रहे हैं।
सुरसा ने हनुमान जी की परीक्षा क्यों ली?
देवता जानना चाहते थे कि लंका की इस कठिन यात्रा के लिए हनुमान जी में बल के साथ बुद्धि और विनम्रता भी है या नहीं। परीक्षा में खरे उतरने पर सुरसा ने उन्हें आशीर्वाद देकर विदा किया।
