बत्तीस साल की उम्र में बोमन ईरानी के पास एक दुकान थी, एक घुटन थी, और एक सवाल जो उन्हें रोज़ सुबह उठाता था — “बस इतना ही?”
दुकान माँ की थी। नागपाड़ा की गली में, एक छोटी-सी जगह जहाँ वेफर्स और नमकीन की खुशबू हमेशा भरी रहती थी। जेरबानू ईरानी सुबह पाँच बजे उठकर सब तैयार कर देती थीं। बोमन काउंटर पर बैठते थे। बेचते थे। हिसाब लगाते थे। रात को थककर सोते थे।
ज़िंदगी चल रही थी।
बस चल ही रही थी।
बचपन में स्कूल में एक शब्द था जो बोमन के लिए हमेशा लिखा जाता था — “मंद।”
टीचर कहती थीं, “ये लड़का ध्यान नहीं देता।” असल में लड़का ध्यान देता था — पर शब्द उलटे-पुलटे दिखते थे। ‘b’ और ‘d’ एक जैसे लगते थे। लाइनें तैरती थीं। पढ़ना शुरू करते तो पन्ना हिलता-सा लगता।
डिस्लेक्सिया। वो नाम तब किसी को नहीं पता था। न बोमन को, न उनकी माँ को, न स्कूल को। सिर्फ यह पता था कि बोमन को जो सब आसान लगता था, वो उन्हें मुश्किल लगता था। और जो उन्हें आसान लगता था — लोगों की नकल उतारना, चेहरे पढ़ना, एक कमरे में बैठकर दस अलग-अलग आवाज़ें निकालना — वो “पढ़ाई” नहीं थी।
पढ़ाई नहीं थी, तो फ़ालतू था।
तो वो बड़े हुए — यह मानकर कि शायद वो थोड़े कम हैं।
ताज होटल में वेटर की नौकरी मिली थी अठारह-उन्नीस की उम्र में।
यूनिफॉर्म इस्त्री की हुई। ट्रे संतुलित रखनी पड़ती थी। मेहमानों की तरफ देखकर मुस्कुराना पड़ता था, चाहे पाँव में छाले हों। टिप में कभी-कभी एक रुपया मिलता था। वो एक रुपया पूरे महीने याद रहता।
एक बार किसी साहब ने ट्रे में रखे खाने की तरफ देखा और कहा, “ये ठीक से सजा नहीं है।”
बोमन ने माफ़ी माँगी। अंदर ही अंदर सोचा — सज्जन, मैं सजावट के लिए नहीं बना।
लेकिन किसलिए बना था — यह अभी पता नहीं था।
पिता की मृत्यु बोमन के जन्म से छह महीने पहले हो गई थी। माँ ने अकेले पाला। पहले बेकरी, फिर वेफर्स की दुकान — जेरबानू ने जो भी चलाया, खड़े होकर चलाया। झुकी नहीं।
बोमन ने माँ को देखकर यही सीखा — कि रोज़ उठो, रोज़ काम करो, शिकायत मत करो।
लेकिन तीस पार करते-करते एक थकान आती है जो नींद से नहीं जाती।
पैंतीस की उम्र में एक शादी थी।
किसी रिश्तेदार की। परिवार वाले थे, शोर था, दुल्हन लाल जोड़े में थी। और जिस फ़ोटोग्राफर को बुलाया था, वो नहीं आया।
किसी ने कहा, “अरे बोमन के पास तो कैमरा है — वो खींचेगा।”
बोमन के पास था भी — पुराना-सा कैमरा, जो उन्होंने ताज होटल में बचाई हुई टिप के पैसों से कभी खरीदा था।
उस दिन बोमन ने पाँच घंटे तस्वीरें खींचीं।
शादी के बाद जब वो फ़ोटो देखी गईं, तो लोग हैरान हो गए।
कोई फ़ोटो थी जिसमें दुल्हन की आँखों में आँसू थे — हँसते हुए। कोई फ़ोटो थी जिसमें बूढ़े नाना एक कोने में अकेले बैठे कुछ देख रहे थे। एक तस्वीर थी बच्चों की — जो खाने की मेज़ के नीचे छुपकर मिठाई खा रहे थे।
दुनिया को जो नहीं दिखता था, वो बोमन की आँख को दिखता था।
अगले कुछ साल बोमन ने फ़ोटोग्राफी में लगाए।
स्टूडियो खोला। रेसकोर्स पर घोड़ों की तस्वीरें खींचीं। स्पोर्ट्स फ़ोटोग्राफी की। कभी अच्छा चला, कभी नहीं।
लेकिन इस सफ़र में एक बात हुई — थिएटर।
माँ ने धकेला था। “तू बोलता अच्छा है। जा, मंच पर कोशिश कर।”
बोमन गए। पहला रोल मिला — एक ऐसे किरदार का जिसे आज कहानी में लिखना ज़रूरी नहीं। लेकिन रोल मिला। और मंच पर खड़े होते ही बोमन को पहली बार लगा — यहाँ मैं हकला नहीं रहा। यहाँ शब्द उलटे नहीं पड़ते। यहाँ मैं ठीक हूँ।
पैंतालीस नहीं — चौवालीस।
2003।
फ़िल्म थी डरना मना है।
डायरेक्टर ने देखा, कास्ट किया, और बोमन ने वो रोल किया जो उन्हें मिला था।
छोटा था रोल। फ़िल्म बड़ी नहीं थी।
लेकिन उसी साल एक और फ़ोन आया।
विधु विनोद चोपड़ा का दफ़्तर था। मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. के लिए बुलावा था।
बोमन ने पहले मना कर दिया।
सच में।
फिर डायरेक्टर राजकुमार हिरानी से मिले। हिरानी ने कहा, “एक बार पढ़ो स्क्रिप्ट।”
बोमन ने पढ़ी। डॉ. अस्थाना का किरदार था — कड़क, कॉमिक, थोड़ा दर्दनाक भी।
उन्होंने हाँ कह दी।
फ़िल्म रिलीज़ हुई।
और जो हुआ, वो हिंदी सिनेमा के दर्शकों को याद है।
लेकिन यह कहानी उस दिन की नहीं है।
यह कहानी उस रात की है जब चौवालीस साल के बोमन ईरानी घर लौटे थे — पहली फ़िल्म के सेट से, थके हुए, थोड़े डरे हुए — और माँ ने चाय बनाई थी।
जेरबानू ने कप रखा और पूछा, “कैसा रहा?”
बोमन ने एक पल रुककर कहा, “माँ, लगा जैसे मैं वही कर रहा हूँ जो करना था।”
माँ ने कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुराईं।
वो मुस्कान उस औरत की थी जिसने पैंतीस साल पहले अकेले एक बच्चे को उठाया था — बिना पति के, बिना सहारे के — और जानती थी कि उसका बेटा किसी दिन यहाँ पहुँचेगा।
बस थोड़ी देर लगेगी।
डिस्लेक्सिया ने बोमन को पढ़ना नहीं सिखाया।
पर उसने उन्हें लोग पढ़ना सिखाया।
वेटर की नौकरी ने उन्हें पैसा नहीं दिया।
पर उसने उन्हें इंतज़ार करना सिखाया।
वेफर्स की दुकान ने उन्हें शोहरत नहीं दी।
पर उसने उन्हें माँ के पास रखा — और माँ ने उन्हें थिएटर तक धकेला।
और थिएटर ने उन्हें वो दिया जो स्कूल कभी नहीं दे सका — यह भरोसा कि तुम ठीक हो। तुम काफ़ी हो।
चौवालीस साल।
देर है? हाँ, है।
बहुत देर है? यह इस पर निर्भर करता है कि तुम किससे पूछ रहे हो।
बोमन ईरानी से पूछो, तो शायद वो हँसकर कहें — “देर कहाँ हुई? अभी तो शुरू हुआ हूँ।”
और वो ग़लत नहीं होंगे।