बम्बई, 1952।
रेकॉर्डिंग स्टूडियो की सीढ़ियाँ उतरते हुए ज़ोहराबाई के हाथ में वही पुराना काला पर्स था जो उन्होंने 1944 में रत्तन की रेकॉर्डिंग के दिन भी थाम रखा था। उस दिन नौशाद साहब ने कहा था — “ज़ोहराबाई, आज आपने कमाल कर दिया।” आज किसी ने कुछ नहीं कहा।
असिस्टेंट ने बस इतना कहा था: “साहब का कहना है… आवाज़ थोड़ी… भारी लगती है इस गाने के लिए।”
भारी।
वो शब्द सीढ़ियाँ उतरते हुए उनके साथ आया। ताँगे में बैठते हुए भी रहा। घर के दरवाज़े तक।
आवाज़ तो हमेशा से भारी थी।
अम्बाला में, नाना के घर में, जब वो बारह-तेरह साल की थीं और घर के कोने में बैठकर तान लगाती थीं, तो पड़ोसी पूछते थे — “ये गाना किसका है? किसी उस्ताद का रियाज़ चल रहा है क्या?”
आवाज़ का यही वज़न था जिसे उस्ताद नासिर हुसैन ख़ान ने पहचाना था। आगरा घराने की तालीम दी थी। कहा था — “ज़ोहरा, तुम्हारी आवाज़ में ज़मीन है। इसे मत बदलना।”
ज़मीन। वही ज़मीन जिसे अब भारी कहा जा रहा था।
1944 का वो साल ज़ोहराबाई के लिए किसी जश्न से कम नहीं था।
रत्तन रिलीज़ हुई। नौशाद की धुनें, और उन पर ज़ोहराबाई की आवाज़ — “अँखियाँ मिला के जिया भरमा के, चले नहीं जाना…” पूरे हिंदुस्तान में बजने लगा। ग्रामोफ़ोन की दुकानों में भीड़ लग जाती थी। लोग सुनते थे, रुकते थे, दोबारा सुनते थे।
उस आवाज़ में कुछ ऐसा था जो रोक लेती थी — जैसे किसी ने गले की गहराई से सच बोला हो।
1946 में अनमोल घड़ी आई। शमशाद बेगम के साथ युगलगीत — “उड़न खटोले पे उड़ जाऊँ…” ज़ोहराबाई की आवाज़ ने शमशाद की रोशनी के साथ जो तानें बुनीं, वो रेडियो पर हफ़्तों गूँजती रहीं।
घर में पति फ़क़ीर मोहम्मद — उस्ताद तबला-वादक — हँसकर कहते: “ज़ोहरा, तुमने मुझसे ज़्यादा नाम कमाया।” और वो भी हँस देतीं।
लेकिन 1947 के बाद कुछ बदलने लगा था। धीरे-धीरे। इतनी धीरे कि शुरू में पता ही नहीं चला।
एक नई आवाज़ आई थी — पतली, ऊँची, जैसे बाँसुरी का सुर।
लता।
पहले एक फ़िल्म में। फिर दो में। फिर हर तरफ़।
संगीत निर्देशकों ने समझाया — “ज़माना बदल रहा है ज़ोहराबाई। दर्शक हल्की आवाज़ पसंद कर रहे हैं।” कुछ ने कहा — “कोशिश कीजिए, थोड़ा ऊपर उठाइए सुर को।” कुछ ने कुछ नहीं कहा — बस फ़ोन आने बंद हो गए।
ज़ोहराबाई ने एक बार अपने पति से पूछा था: “फ़क़ीर, मेरी आवाज़ में क्या कमी है?”
वो चुप रहे।
वो जानते थे — कमी कोई नहीं थी। बस बाज़ार बदल गया था। जिस चीज़ की क़ीमत कल थी, आज उसकी जगह कुछ और आ गया था।
1952 के बाद काम धीरे-धीरे बंद हो गया।
आख़िरी गाना 1957 में आया — नौशेरवाँ-ए-आदिल के लिए। “मेरे दर्द-ए-जिगर की हर धड़कन…” — ज़ोहराबाई ने गाया। रिकॉर्ड हुआ। रिलीज़ हुआ। किसी ने नोटिस नहीं किया।
फिर कोई फ़ोन नहीं आया।
वो जानती थीं कि यही अंत था। लेकिन उन्होंने रोया नहीं। रोना नहीं आया, या शायद वो आवाज़ जो ज़मीन से उठती थी, वो आँसुओं से बड़ी थी।
बेटी रोशन बड़ी हो रही थी।
ज़ोहराबाई उसे बचपन से देखती थीं — पाँव में घुंघरू, कमर में लय, आँखों में वही एकाग्रता जो उस्तादों में होती है। कथक। फ़क़ीर मोहम्मद की तालीम, और ऊपर से अपना ज़िद्द।
जब दुनिया ज़ोहराबाई को भूल रही थी, रोशन एक नई दुनिया में अपनी जगह बना रही थी।
ज़ोहराबाई ने कभी नहीं कहा — “मेरा नाम है, मेरी इज़्ज़त है, मुझे याद रखो।” उन्होंने बस बेटी की रियाज़ में बैठकर गाती रहीं — तानपूरा उठाया, सुर साधा, और रोशन के पाँव के साथ अपनी आवाज़ मिलाई।
एक रात — साल याद नहीं, शायद 1960 का दशक — बम्बई के एक छोटे-से सभागार में रोशन कुमारी का कथक कार्यक्रम था।
पर्दे के पीछे, एक कुर्सी पर, तानपूरा लिए बैठी थीं ज़ोहराबाई।
सभागार भरा था। रोशन मंच पर आई। घुंघरू बोले। तबला गूँजा।
और पर्दे के पीछे से एक आवाज़ उठी — भारी, गहरी, जैसे मिट्टी से निकलती हो।
आगे की पंक्तियों में बैठे कुछ बुज़ुर्ग लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। एक ने धीरे से कहा: “ये आवाज़… ये तो…”
“हाँ,” दूसरे ने कहा। “ज़ोहराबाई।”
लेकिन जब कार्यक्रम के बाद पर्दे के पीछे झाँका, वो जा चुकी थीं।
ज़ोहराबाई अम्बालेवाली 21 फ़रवरी 1990 को इस दुनिया से गईं। इकहत्तर साल की उम्र में।
उनकी बेटी रोशन कुमारी को 1975 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला, 1984 में पद्मश्री। लोग उनके बारे में जानते हैं — कथक की एक महान् विरासत।
बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस पर्दे के पीछे से वो आवाज़ उठती थी, वो ज़ोहराबाई थीं।
जिन्होंने कभी “भूल गए” नहीं कहा।
जो बस गाती रहीं — उस वक़्त भी, जब दुनिया सुन नहीं रही थी।
“अँखियाँ मिला के जिया भरमा के, चले नहीं जाना…”
आवाज़ें नहीं मरतीं।
कभी-कभी वो बस पर्दे के पीछे चली जाती हैं।