जंगल में सबसे पुराना पेड़ था बरगद बाबा। उनकी जड़ें ज़मीन के नीचे इतनी दूर तक फैली थीं कि वो जानते थे कौन सी चींटी कहाँ रहती है, कौन सी नदी किस रास्ते से बहती है, और कौन सा फूल कब खिलेगा।
एक सुबह बरगद बाबा ने नन्हे टीपू को बुलाया।
टीपू अभी छोटा था — इतना छोटा कि उसकी सूँड अभी ज़मीन तक मुश्किल से पहुँचती थी, और इतना बड़ा कि उसे लगता था वो दुनिया की हर बात समझता है।
“टीपू,” बरगद बाबा बोले, उनकी आवाज़ हवा जैसी धीमी थी, “आज की रात साल की एक ख़ास रात है।”
“क्या होगा आज रात?” टीपू ने कान फड़फड़ाए।
“आज रात ठीक बारह बजे, इस जंगल में एक फूल खिलेगा। चाँदी जैसा सफ़ेद, और उसकी रोशनी में पूरा जंगल चमक उठेगा। पर वो फूल हर किसी को नहीं दिखता।”
“किसको दिखता है?”
बरगद बाबा मुस्कुराए। “जो दिल का सच्चा हो। जो रास्ते में किसी की मदद करता हो। उसी को।”
टीपू की आँखें बड़ी हो गईं।
“मैं देखूँगा वो फूल! मैं अभी निकलता हूँ ढूँढने।”
बरगद बाबा कुछ कहना चाहते थे, पर टीपू तो दौड़ चुका था।
जंगल बड़ा था और टीपू छोटा।
वो उत्तर की तरफ़ चला, जहाँ झरना था। उसने सोचा — फूल वहीं होगा, पानी के पास।
रास्ते में एक छोटा सा गड्ढा था। गड्ढे में थोड़ा सा पानी, और पानी में एक मेंढक का बच्चा फँसा हुआ था। दीवारें फिसलन भरी थीं, वो बार-बार कूदता और गिर जाता।
टीपू रुका।
“अरे, तुम तो छोटे हो मुझसे भी,” वो बोला।
उसने अपनी नन्ही सूँड गड्ढे में डाली। मेंढक का बच्चा उछलकर सूँड पर चढ़ गया। टीपू ने उसे बाहर रख दिया, घास पर।
“अब जल्दी से माँ के पास जाओ।”
मेंढक का बच्चा कूदता हुआ चला गया। टीपू ने एक पल भी रुककर नहीं सोचा कि उसने कुछ ख़ास किया है। उसे तो फूल ढूँढने जाना था।
वो आगे बढ़ा।
जिस घास पर उसके पैर का निशान बना था, वहाँ की मिट्टी थोड़ी सी नम हो गई थी।
दोपहर तक टीपू थक गया।
झरने पर पहुँचा। पानी पिया, पर फूल कहीं नहीं था। न चाँदी का, न सफ़ेद का। बस पत्थर थे और बहता हुआ पानी।
“शायद फूल पूरब में हो,” उसने सोचा। और चल पड़ा।
रास्ते में एक तितली पंख फड़फड़ा रही थी ज़मीन पर। उसका एक पंख गीला हो गया था ओस से। वो उड़ नहीं पा रही थी।
टीपू ने झुककर देखा।
“तुम यहाँ क्यों पड़ी हो?”
तितली ने कुछ नहीं कहा — तितलियाँ बोलती नहीं हैं। पर उसके पंख काँप रहे थे।
टीपू ने धीरे से अपनी सूँड से हवा फूँकी — बहुत हल्के, बहुत प्यार से। तितली का पंख सूख गया। वो उड़ी, टीपू के सिर के ऊपर एक चक्कर लगाया, और चली गई।
टीपू मुस्कुराया।
फिर याद आया — फूल! वो दौड़ा।
जहाँ तितली ज़मीन पर पड़ी थी, वहाँ की मिट्टी में एक छोटी सी हरी कोंपल फूट निकली। पर टीपू ने मुड़कर नहीं देखा।
शाम होने लगी।
टीपू अब परेशान था। उसने पूरा जंगल छान मारा था — उत्तर, पूरब, दक्षिण। फूल कहीं नहीं था।
“शायद बरगद बाबा ने मज़ाक किया,” वो उदास होकर बोला।
एक नदी के किनारे वो बैठ गया। उसकी सूँड पानी में लटक रही थी।
तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी — बहुत धीमी, बहुत डरी हुई।
“मदद… कोई है?”
टीपू ने इधर-उधर देखा। किनारे के पत्थरों के बीच एक चिड़िया का बच्चा था। उसका घोंसला हवा से गिर गया था, और वो ज़मीन पर पड़ा था, उड़ना नहीं जानता था।
टीपू उठा। बहुत सावधानी से उसने चिड़िया के बच्चे को अपनी सूँड पर बिठाया। फिर पेड़ की तरफ़ देखा — घोंसला ऊँचा था।
वो खड़ा हो गया अपनी पूरी छोटी सी ऊँचाई पर, सूँड को जितना उठा सकता था उठाया, और बच्चे को घोंसले के पास पहुँचा दिया।
ऊपर से एक माँ चिड़िया उतरी। उसने टीपू की तरफ़ देखा। कुछ कहा नहीं — पर उसकी आँखें भर आई थीं।
टीपू को ख़ुद नहीं पता था कि उसने कुछ बड़ा किया है। उसके लिए ये बस एक काम था जो करना था।
वो वापस मुड़ा।
जिस नदी के किनारे वो खड़ा था, वहाँ की मिट्टी पर एक और हरी कोंपल फूट निकली।
रात हो गई।
टीपू वापस बरगद बाबा के पास पहुँचा। उसके पैर दुख रहे थे, उसकी आँखों में थकान थी।
“बाबा, फूल नहीं मिला।”
बरगद बाबा ने उसे देखा। बहुत देर तक देखा।
“बेटा, सो जाओ। बहुत चले हो।”
टीपू बरगद बाबा की एक मोटी जड़ के पास लेट गया। दो मिनट में सो गया।
रात के ठीक बारह बजे, जंगल में कुछ हुआ।
जहाँ मेंढक का बच्चा बचाया गया था — वहाँ एक फूल खिला। चाँदी जैसा सफ़ेद। उसकी रोशनी में मेंढक का पूरा परिवार चमक उठा। बच्चे की माँ ने उसे कसकर पकड़ रखा था।
जहाँ तितली के पंख सूखे थे — वहाँ दूसरा फूल खिला। तितली अपने झुंड के साथ उसके चारों तरफ़ नाच रही थी।
जहाँ चिड़िया का बच्चा घोंसले में पहुँचाया गया था — वहाँ तीसरा फूल खिला। उसकी रोशनी में पूरा पेड़ चमक रहा था, और घोंसले में बच्चा सो रहा था अपनी माँ के पंखों के नीचे।
पूरे जंगल में, जहाँ-जहाँ नन्हे टीपू के पैर के निशान थे, वहाँ-वहाँ चाँदी के फूल खिले।
जंगल इतना सुंदर पहले कभी नहीं था।
टीपू सोता रहा।
उसने फूल नहीं देखा।
पर बरगद बाबा ने देखा। उन्होंने अपनी पुरानी आँखों से पूरा जंगल देखा — हर फूल, हर रोशनी। और वो धीरे से मुस्कुराए।
“बेटा,” उन्होंने सोते हुए टीपू से बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “फूल तुम्हें इसलिए नहीं दिखा क्योंकि फूल तुम्हारे लिए नहीं था।”
“फूल उनके लिए था जिनकी तुमने मदद की। ताकि वो जान सकें — दुनिया में कोई है जिसे उनकी परवाह है।”
टीपू सोता रहा।
उसकी सूँड हल्के से हिली, जैसे सपने में कोई अच्छी बात हुई हो।
बरगद बाबा ने अपने पत्ते हिलाए, और रात की हवा ने नन्हे हाथी को ढक दिया।
जंगल चमकता रहा, बारह बजे से सुबह तक।
और टीपू को कभी पता नहीं चला।
पर शायद… कुछ चीज़ें न जानना ही सबसे प्यारी बात होती है।