सुबह के पौने नौ बजे थे।
इलाहाबाद की फरवरी की हवा अभी ठंडी थी। अल्फ्रेड पार्क के एक कोने में, जामुन के पेड़ के नीचे, दो आदमी बैठे थे। एक की उम्र चौबीस साल थी। दूसरे की उससे थोड़ी कम।
चौबीस साल वाले का नाम चंद्रशेखर आज़ाद था।
उसने अपनी जेब से एक छोटी सी डिबिया निकाली, उसमें से दो इलायची निकालीं, एक सुखदेव राज की तरफ बढ़ा दी। सुखदेव ने ले ली, मुँह में डाली, चुप रहा।
“भगत के लिए कुछ करना होगा।” आज़ाद की आवाज़ धीमी थी। “फाँसी की तारीख तय हो चुकी है। चौबीस मार्च।”
सुखदेव ने सिर हिलाया।
“वायसराय से मिलना मुश्किल है। पर असंभव नहीं।” आज़ाद ने जामुन की एक टहनी तोड़ी, उसे उँगलियों में घुमाने लगा। “नेहरू जी से मिला था परसों। आनंद भवन में। उन्होंने कहा कोशिश करेंगे। पर…”
वो रुक गया।
सुखदेव ने उसकी तरफ देखा। आज़ाद के चेहरे पर वो थकान थी जो आदमी को सालों भागते रहने के बाद आती है — आँखों के नीचे काले घेरे, गालों पर हलकी दाढ़ी, माथे पर एक नस जो साँस लेने पर हिलती थी।
“पर क्या?” सुखदेव ने पूछा।
“पर अंग्रेज़ों पर भरोसा कहाँ है।”
आठ बज कर पचास मिनट।
पार्क में चहल-पहल कम थी। एक माली दूर पेड़ों के बीच कुछ काट रहा था। एक बूढ़ा आदमी अख़बार पढ़ता हुआ टहल रहा था। एक रिक्शे वाला अपने रिक्शे के पास खड़ा बीड़ी पी रहा था।
आज़ाद ने अपनी पिस्तौल — कोल्ट ऑटोमैटिक, जिसे वो “बमतुल बुख़ारा” कहता था — एक बार चेक की। मैगज़ीन में सोलह गोलियाँ थीं। उसने उसे वापस अपनी धोती की तह में छुपा लिया।
सोलह गोलियाँ। और एक — जो हमेशा अलग रखी जाती थी। चैम्बर में।
वो आख़िरी गोली उसके लिए थी।
ये क़सम उसने झाँसी में खाई थी, कई साल पहले। कि अंग्रेज़ उसे जिंदा नहीं पकड़ पाएँगे। उसका नाम ही “आज़ाद” इसी वजह से था — पन्द्रह साल की उम्र में जब अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट ने उससे नाम पूछा था, तो उसने कहा था: “आज़ाद।” बाप का नाम? “स्वतंत्रता।” घर? “जेलख़ाना।”
उस दिन से अब तक — एक भी दिन ऐसा नहीं आया था जब उसकी जेब में वो आख़िरी गोली न हो।
“और सुरेन्द्र?” आज़ाद ने पूछा।
“वो दो दिन पहले मिला था। कह रहा था पैसे की दिक्कत है।”
आज़ाद ने एक लंबी साँस ली।
“पैसा।” उसने जैसे ख़ुद से कहा। “हम अपने देश के लिए मर रहे हैं और हमें पैसे की दिक्कत है।”
आठ बज कर पचपन मिनट।
सुखदेव ने महसूस किया — आज़ाद आज अलग था। ज़्यादा चुप। ज़्यादा सोचता हुआ।
“भैया,” उसने हिम्मत करके पूछा, “तबियत ठीक है?”
आज़ाद हँसा। एक छोटी, थकी हुई हँसी।
“तबियत?” उसने कहा। “तबियत तो उस दिन ठीक होगी जिस दिन इस मुल्क में एक भी अंग्रेज़ नहीं बचेगा।”
फिर वो थोड़ा रुका।
“माँ की चिट्ठी आई थी। भाबरा से। पिताजी ठीक नहीं हैं।”
सुखदेव कुछ नहीं बोला। वो जानता था आज़ाद पाँच साल से घर नहीं गया था। नहीं जा सकता था। उसके सिर पर अंग्रेज़ों ने इनाम रखा था — तीस हज़ार रुपये। उन दिनों ये बहुत बड़ी रक़म थी।
“माँ को क्या लिखूँ?” आज़ाद ने जामुन की टहनी ज़मीन पर फेंक दी। “कि बेटा ठीक है? कि जल्दी आ जाएगा?”
नौ बज कर दो मिनट।
पार्क के दूसरे छोर पर एक काली मोटर गाड़ी रुकी।
आज़ाद ने नहीं देखा। सुखदेव ने भी नहीं।
गाड़ी से तीन आदमी उतरे। एक अंग्रेज़ — हलके रंग का सूट, हैट, छोटी मूँछें। उसका नाम था नॉट-बावर। सीआईडी का सुपरिंटेंडेंट। उसके साथ दो हिंदुस्तानी सिपाही — पगड़ियाँ, खाकी वर्दी, हाथ में राइफ़लें।
किसी ने ख़बर दी थी। कौन — ये कभी पूरी तरह तय नहीं हो पाया। कुछ कहते हैं वीरभद्र तिवारी। कुछ कुछ और। पर ख़बर पहुँच गई थी।
नॉट-बावर पेड़ों की आड़ में चलने लगा।
नौ बज कर पाँच मिनट।
आज़ाद ने सबसे पहले उसे देखा।
वो जामुन के पेड़ के नीचे बैठा था, और उसकी पीठ पार्क की तरफ़ थी। पर एक छाया — जो हिल रही थी जहाँ हिलनी नहीं चाहिए थी — उसकी आँख से नहीं छूटी।
“सुखदेव।” आवाज़ बहुत धीमी थी। “भागो।”
सुखदेव ने सर उठाया।
“क्या हुआ?”
“भागो। अभी। पीछे मत देखना।”
सुखदेव ने एक पल के लिए सोचा कि वो रुके। फिर आज़ाद की आँखें देखीं। उन आँखों में दलील की जगह नहीं थी।
वो उठा। तेज़ क़दमों से जामुन के पेड़ के पीछे की झाड़ियों की तरफ़ बढ़ा। फिर दौड़ने लगा।
एक गोली चली। सुखदेव के पीछे, हवा में। वो रुका नहीं।
नौ बज कर सात मिनट।
आज़ाद उछल कर जामुन के पेड़ के पीछे आ गया। पेड़ का तना मोटा था — एक आदमी की आड़ के लिए काफ़ी।
उसने अपनी पिस्तौल निकाली।
पार्क के बीच में नॉट-बावर खड़ा था, अपनी रिवॉल्वर ताने हुए। दोनों सिपाही दो अलग-अलग पेड़ों की आड़ में थे।
“सरेंडर!” नॉट-बावर ने अंग्रेज़ी में चिल्लाया। “तुम घिर चुके हो!”
आज़ाद ने जवाब नहीं दिया।
उसने पेड़ के पीछे से एक तेज़ नज़र डाली, नॉट-बावर की पोज़िशन देखी, और गोली चलाई।
गोली नॉट-बावर के जबड़े के पास से निकली। वो ज़मीन पर गिर पड़ा — मरा नहीं, पर ज़ख़्मी।
दोनों सिपाहियों ने फायरिंग शुरू कर दी।
नौ बज कर बारह मिनट।
पेड़ की छाल से लकड़ी के टुकड़े उड़ रहे थे। आज़ाद ने एक और गोली चलाई। फिर एक और।
एक सिपाही गिरा।
दूसरे ने पोज़िशन बदली, एक झाड़ी के पीछे आ गया, और एक लंबी बौछार चलाई।
एक गोली आज़ाद की दायीं जाँघ में लगी।
वो लड़खड़ाया, पर गिरा नहीं। पेड़ को कस कर पकड़ा। एक पल के लिए साँस रुक गई। फिर वापस आई।
ख़ून बहने लगा। धोती लाल हो रही थी।
नौ बज कर अठारह मिनट।
अब तक पार्क के बाहर शोर मच चुका था। और सिपाही आ रहे थे। आज़ाद को आवाज़ें सुनाई दे रही थीं — सीटियाँ, बूटों की आवाज़, अंग्रेज़ी में हुक्म।
वो जानता था जाँघ की गोली के साथ वो ज़्यादा देर खड़ा नहीं रह सकेगा।
उसने अपनी मैगज़ीन गिनी। तीन गोलियाँ बची थीं। और चैम्बर वाली एक।
तीन गोलियाँ बाहर के लिए। एक अंदर के लिए।
नौ बज कर बाईस मिनट।
दूसरे सिपाही ने एक और बौछार चलाई। आज़ाद ने जवाब में दो गोलियाँ चलाईं। एक सिपाही के कंधे में लगी।
अब उसके पास एक गोली बची थी पिस्तौल की मैगज़ीन में।
और चैम्बर में एक।
नौ बज कर पच्चीस मिनट।
ख़ून बहुत निकल चुका था। उसकी टाँग सुन्न हो रही थी। पेड़ का तना अब उसके वज़न को सम्भाल रहा था।
उसने नीचे देखा। ज़मीन पर अपने ख़ून का दायरा देखा। फिर ऊपर — जामुन के पेड़ के पत्तों के बीच से छनती हुई धूप देखी।
एक पल — सिर्फ़ एक पल — के लिए उसे माँ याद आई।
जगरानी देवी। भाबरा गाँव में। उसने सोचा होगा कि उसका बेटा अब घर लौटेगा।
फिर उसने वो ख़याल झटक दिया।
नौ बज कर सत्ताईस मिनट।
सिपाही पास आ रहे थे। आवाज़ें क़रीब आ रही थीं।
आज़ाद ने अपनी पिस्तौल की आख़िरी मैगज़ीन वाली गोली चलाई। उसे कोई परवाह नहीं थी कि वो किसी को लगी या नहीं। उसका मक़सद उन्हें कुछ और सेकंड के लिए रोकना था।
अब उसकी पिस्तौल में एक ही गोली थी।
वो जो हमेशा से उसकी थी।
नौ बज कर अट्ठाईस मिनट।
उसने पिस्तौल को अपनी कनपटी की तरफ़ उठाया।
एक पल के लिए उसका हाथ रुका।
ये पल — बाद में जब लोग लिखते थे, तो बहुत कुछ लिखते थे। कि उसने क्या सोचा होगा। कि कौन सी आख़िरी छवि उसकी आँखों के सामने आई होगी। माँ। भगत। पिताजी। भाबरा का घर। झाँसी का गंगा का किनारा। काकोरी का धमाका।
पर सच ये है कि कोई नहीं जानता उसने उस आख़िरी सेकंड में क्या सोचा।
शायद कुछ भी नहीं सोचा।
शायद बस एक काम पूरा कर रहा था जो उसने सालों पहले शुरू किया था।
नौ बज कर अट्ठाईस मिनट और तीस सेकंड।
एक गोली चली।
जामुन का पेड़ हिला नहीं। पत्ते वैसे ही धूप में चमकते रहे।
जब सिपाही पास पहुँचे, तब भी पहले कुछ देर वो उसके पास जाने से डरते रहे। उन्हें यक़ीन नहीं हो रहा था कि वो आदमी सच में मर चुका है।
नॉट-बावर ने बाद में अपनी रिपोर्ट में लिखा कि आज़ाद की पिस्तौल अभी भी उसके हाथ में पकड़ी हुई थी।
मैगज़ीन ख़ाली थी।
चैम्बर — ख़ाली।
जो वादा झाँसी में किया गया था, वो अल्फ्रेड पार्क में पूरा हुआ।
उसकी लाश को अंग्रेज़ों ने रसूलाबाद घाट पर चुपके से जला दिया। डर था कि अगर लोग जान गए तो दंगा हो जाएगा। पर ख़बर फैल गई। शाम तक हज़ारों लोग घाट पर पहुँच चुके थे — आज़ाद की राख समेटने के लिए।
जामुन का वो पेड़ अल्फ्रेड पार्क में सालों तक खड़ा रहा।
लोग आते थे, उसकी छाल पर हाथ रखते थे, चुप रहते थे।
पार्क का नाम बाद में बदल कर चंद्रशेखर आज़ाद पार्क रख दिया गया।
पर पेड़ — पेड़ ने अपना नाम नहीं बदला। वो जामुन का पेड़ ही रहा।
जिसके नीचे एक चौबीस साल का लड़का अपनी ज़िंदगी का आख़िरी डेढ़ घंटा बैठा था, इलायची खाता हुआ, माँ को याद करता हुआ, और एक गोली अपने लिए बचाए हुए।