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टिमटिमाते जुगनू और काली रात

Rajhussain · 25-May-2026 5 मिनट में पढ़ें
टिमटिमाते जुगनू और काली रात

रिमझिम सबसे छोटा जुगनू था।

इतना छोटा कि जब वो उड़ता, तो उसकी रोशनी ज़मीन तक भी मुश्किल से पहुँचती। बाकी जुगनू उसे देखकर हँसते।

“रिमझिम, तेरी बत्ती तो दीये की लौ भी नहीं,” बड़ा जुगनू कहता।

“ऐसी रोशनी से क्या होगा? रात तो काली ही रहेगी,” दूसरा बोलता।

रिमझिम कुछ नहीं कहता। बस अपने पंख समेटकर पीपल के पत्ते के पीछे छुप जाता।


उस रात आसमान में चाँद नहीं था।

जंगल इतना काला था कि पेड़ों की परछाइयाँ भी नहीं दिखती थीं। बाकी सारे जुगनू झुंड में थे — एक साथ चमकते, एक साथ हँसते। रिमझिम उनके पास नहीं गया। उसे डर लग रहा था कि आज फिर कोई उसकी छोटी सी रोशनी पर हँसेगा।

वो चुपचाप उड़ गया। अकेला।

जंगल के उस हिस्से में, जहाँ कोई नहीं जाता।

हवा ठंडी थी। पेड़ों के पत्ते सरसरा रहे थे। रिमझिम का छोटा सा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

“मैं वापस चला जाऊँ?” उसने सोचा।

पर वापस जाकर भी क्या होगा? वहाँ फिर वही हँसी होगी।

वो उड़ता रहा।


तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

बहुत धीमी। बहुत डरी हुई।

कोई रो रहा था।

रिमझिम रुक गया। उसने कान लगाए।

“माँ… माँ…”

ये आवाज़ किसी बच्चे की थी। बहुत छोटे बच्चे की।

रिमझिम को कुछ समझ नहीं आया। बच्चा यहाँ क्यों होगा? इतनी रात में? इतने अंधेरे में?

उसका मन हुआ कि वापस उड़ जाए। ये उसका काम नहीं था। वो तो खुद डरा हुआ था।

पर वो आवाज़…

वो आवाज़ उससे भी ज़्यादा डरी हुई थी।

रिमझिम धीरे-धीरे उस आवाज़ की तरफ़ बढ़ा।


एक झाड़ी के पास, ज़मीन पर, एक छोटी सी बच्ची बैठी थी।

उसके हाथ में एक टूटी हुई चूड़ी थी। उसके गाल आँसुओं से भीगे हुए थे। उसके पैर मिट्टी में सने हुए थे।

वो शायद रास्ता भूल गई थी।

रिमझिम उसके सामने आकर रुक गया। हवा में टिमटिमाता हुआ। बहुत छोटा। बहुत डरा हुआ।

बच्ची ने उसे देखा।

उसके आँसू एक पल के लिए रुक गए।

“जुगनू…” उसने धीरे से कहा।

रिमझिम कुछ नहीं बोला। वो बोल ही नहीं सकता था। वो तो बस चमक सकता था — और वो भी इतना कम कि किसी को दिखाई न दे।

पर इस बच्ची को दिख रहा था।


बच्ची उठ खड़ी हुई।

उसने अपने आँसू पोंछे। और रिमझिम की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

रिमझिम पीछे हट गया। थोड़ा सा। बस इतना कि उसकी रोशनी बच्ची के सामने वाले रास्ते पर पड़े।

बच्ची ने एक कदम बढ़ाया।

रिमझिम और थोड़ा आगे उड़ा।

बच्ची ने एक और कदम बढ़ाया।

रिमझिम को नहीं पता था वो कहाँ जा रहा है। उसे बस इतना पता था कि अगर वो रुकेगा, तो ये बच्ची भी रुक जाएगी। और अगर ये यहाँ रुक गई, इस अंधेरे जंगल में, अकेली — तो…

वो आगे उड़ता रहा।

बच्ची उसके पीछे चलती रही।


कितनी देर तक? रिमझिम को नहीं पता।

उसके पंख थक गए थे। उसका छोटा सा शरीर काँप रहा था। पर वो रुका नहीं।

बच्ची भी थक रही थी। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। पर उसकी आँखें रिमझिम पर टिकी थीं।

एक छोटी सी रोशनी।

बस वही दिख रही थी।


फिर अचानक — दूर से एक आवाज़ आई।

“गुड़िया! गुड़ियाऽऽ!”

कोई पुकार रहा था।

बच्ची के चेहरे पर एक चमक आ गई।

“पापा!” वो ज़ोर से चिल्लाई। “पापा, मैं यहाँ हूँ!”

वो भागी।

रिमझिम वहीं रुक गया। हवा में। टिमटिमाता हुआ।

उसने देखा — बच्ची एक आदमी की तरफ़ दौड़ रही थी। वो आदमी हाथ में लालटेन लिए हुए था। उसने बच्ची को गोद में उठा लिया। दोनों रो रहे थे।

“तू कहाँ चली गई थी, मेरी जान?” आदमी ने पूछा।

“पापा, एक जुगनू था…” बच्ची ने पीछे मुड़कर देखा।

पर रिमझिम वहाँ नहीं था।

वो उड़ चुका था।


रिमझिम वापस अपने पीपल के पेड़ की तरफ़ लौट रहा था।

बाकी जुगनू अभी भी झुंड में थे। चमकते। हँसते। रिमझिम चुपचाप एक पत्ते के पीछे जाकर बैठ गया।

किसी ने उसे नहीं देखा।

किसी ने नहीं पूछा वो कहाँ था।

वो वैसा ही था जैसा रोज़ होता था — सबसे छोटा, सबसे कम चमकीला जुगनू।

पर उस रात, जब वो सोने के लिए अपने पंख समेट रहा था, उसे एक बात समझ में आई।

रोशनी कितनी छोटी है, ये मायने नहीं रखता।

मायने ये रखता है कि अंधेरे में कोई उसे देख रहा है या नहीं।

और कहीं दूर, एक छोटी सी बच्ची अपनी माँ की गोद में सो रही थी।

उसके सपने में एक नन्हा सा जुगनू था।

टिमटिमाता हुआ।

रास्ता दिखाता हुआ।

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