Biography

2012 की एक शाम थी। मुंबई में बारिश रुक चुकी थी, पर बादल हटे नहीं थे।

Rajhussain · 24-May-2026 7 मिनट में पढ़ें
2012 की एक शाम थी। मुंबई में बारिश रुक चुकी थी, पर बादल हटे नहीं थे।

फाल्गुनी नायर अपने केबिन में बैठी थीं — कोटक महिंद्रा कैपिटल की मैनेजिंग डायरेक्टर। उन्नीस साल इसी इमारत में बीते थे। लंदन का दफ्तर उन्होंने खोला था, न्यूयॉर्क का भी। मेज़ पर एक फाइल खुली थी, पर वो उसे पढ़ नहीं रही थीं। खिड़की के बाहर देख रही थीं।

उनकी उम्र उनचास साल थी।

और वो एक नौकरी छोड़ने के बारे में सोच रही थीं जिसे देश की हज़ारों लड़कियाँ पाने का सपना देखती थीं।


बात कुछ हफ़्ते पहले की है।

डाइनिंग टेबल पर अद्वैता बैठी थी — उनकी बेटी, बाईस साल की, अभी-अभी पढ़ाई के बाद घर लौटी हुई। फ़ोन में कुछ देख रही थी। फाल्गुनी ने यूँ ही पूछ लिया कि आजकल लड़कियाँ ऑनलाइन क्या-क्या ख़रीदती हैं।

अद्वैता ने सिर भी नहीं उठाया। बस कहा — “मम्मा, इंडिया में लड़कियाँ ऑनलाइन सब कुछ ख़रीद लेती हैं। कपड़े, किताबें, फ़ोन। सब कुछ।”

फिर एक पल रुकी।

“सिर्फ़ मेकअप नहीं ख़रीदतीं। उसके लिए दुकान जाना पड़ता है।”

बस इतना ही कहा था उसने। और वापस फ़ोन में खो गई।

पर फाल्गुनी उस रात सो नहीं पाईं।


वो कोई साधारण औरत नहीं थीं जो किसी बात पर बहक जाएँ। उन्होंने पूरी ज़िंदगी संख्याओं के साथ बिताई थी। सौदे, हिसाब, जोखिम — यही उनकी भाषा थी। वो जानती थीं कि एक अच्छे विचार और एक चलने वाले धंधे में कितना फ़र्क होता है।

पर बेटी की वो एक लाइन दिमाग़ से निकल नहीं रही थी।

एक देश जहाँ करोड़ों औरतें थीं। और उनके पास सुंदर बनने के लिए, अपने लिए कुछ चुनने के लिए, एक ढंग की जगह तक नहीं थी। न भरोसे का सामान, न असली ब्रांड, न सलाह। बस गली के कोने की दुकानें, जहाँ दुकानदार आपको वही बेच देता था जो उसके पास पड़ा हो।

ये कोई छोटी कमी नहीं थी। ये एक खाली जगह थी। और फाल्गुनी ने अपनी पूरी ज़िंदगी खाली जगहों को पहचानने में ही तो बिताई थी।


सबसे मुश्किल बातचीत संजय के साथ हुई।

संजय नायर — उनके पति, ख़ुद फ़ाइनेंस की दुनिया का एक बड़ा नाम। दोनों आईआईएम अहमदाबाद में मिले थे, पचीस साल हो गए थे साथ रहते हुए। संजय जानते थे कि फाल्गुनी कब किसी बात पर सच में अड़ जाती हैं।

फाल्गुनी ने उन्हें बताया कि वो क्या सोच रही हैं।

संजय ने तुरंत ‘हाँ’ या ‘नहीं’ नहीं कहा। वो भी इसी दुनिया के आदमी थे — उन्होंने वही पूछा जो कोई भी समझदार आदमी पूछता।

“तुम पचास की होने वाली हो, फाल्गुनी।”

ये कोई ताना नहीं था। बस एक सच्चाई थी, मेज़ पर रखी हुई।

“तुमने इतने साल लगाकर ये मुक़ाम पाया है। सब कुछ ठीक चल रहा है। और तुम एक ऐसे धंधे में जाना चाहती हो जिसका तुम्हें कोई तजुर्बा नहीं। न रिटेल का, न ब्यूटी का, न टेक्नोलॉजी का।”

फाल्गुनी कुछ देर चुप रहीं।

फिर बोलीं — “मैं पचास की हो रही हूँ, इसीलिए तो जाना चाहती हूँ। अभी नहीं तो कभी नहीं।”


उन्होंने हमेशा ख़ुद से एक वादा कर रखा था। एक तरह की समय-सीमा। कि अगर ज़िंदगी में कभी कुछ अपना शुरू करना है, तो पचास से पहले। उसके बाद डर बहुत बड़ा हो जाता है, और हिम्मत बहुत छोटी।

जुड़वाँ बच्चे — अद्वैता और अंचित — अब बड़े हो चुके थे, अपनी राह पर थे। पहली बार उनके पास वक़्त था। और पहली बार ये सवाल सामने था कि उस वक़्त का करें क्या।

जब उन्होंने अपने बेटे को बताया कि वो बैंक की नौकरी छोड़कर ख़ुद की कंपनी बनाने जा रही हैं, तो वो भी एक पल के लिए चौंक गया था। माँ, जो ज़िंदगी भर एक बड़ी कंपनी की बड़ी अफ़सर रही थीं — अब शून्य से शुरू करेंगी?

फाल्गुनी को भी डर लग रहा था। उन्होंने ख़ुद बाद में माना कि वो सहमी हुई थीं। पर डर और फ़ैसले में फ़र्क होता है। डर मन में था। फ़ैसला हो चुका था।

2012 में, उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया।


जो लोग सोचते हैं कि एक तजुर्बेकार बैंकर के पास पैसा जुटाना आसान होगा — वो ग़लत सोचते हैं।

फाल्गुनी सत्रह निवेशकों के पास गईं। अपना विचार रखा। एक देश की करोड़ों औरतों के लिए एक भरोसेमंद ब्यूटी प्लेटफ़ॉर्म।

सत्रह में से दस ने मना कर दिया।

किसी को उम्र पर शक था। किसी को लगा कि भारत में औरतें ऑनलाइन मेकअप कभी नहीं ख़रीदेंगी। किसी को बस ये अजीब लगा कि एक कामयाब इन्वेस्टमेंट बैंकर अपनी जमी-जमाई कुर्सी छोड़कर लिपस्टिक बेचने क्यों जाना चाहती है।

सात लोग राज़ी हुए।

फाल्गुनी ने बाक़ी पैसा ख़ुद लगाया — अपनी जमा-पूँजी से, करीब दो करोड़ रुपये। उन्होंने ख़ुद पर दाँव लगाया, क्योंकि बाक़ी आधी दुनिया तैयार नहीं थी।

कंपनी का नाम रखा — Nykaa। संस्कृत शब्द ‘नायक’ से। वो जो केंद्र में हो। वो जो रौशनी में खड़ी हो।

शुरुआत में सिर्फ़ तीन कर्मचारी थे। काम एक छोटी-सी जगह से चलता था।


फिर नौ साल बीते।

इन नौ सालों की कहानी अलग है — गोदामों की, ब्रांड्स से सौदों की, उन फ़ैसलों की जब बाक़ी सब ई-कॉमर्स कंपनियाँ एक रास्ते पर भाग रही थीं और फाल्गुनी ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने सामान ख़ुद ख़रीदा, ख़ुद के गोदाम बनाए, ख़ुद हर चीज़ की निगरानी की। क्योंकि ब्यूटी में असली बात भरोसा था — कि जो डिब्बा घर पहुँचे, वो नक़ली न हो।

ये सब बहुत मेहनत का काम था। पर ये उस एक शाम का नतीजा था, जब उन्होंने खिड़की के बाहर देखते हुए तय कर लिया था।


10 नवंबर, 2021।

नायका शेयर बाज़ार में लिस्ट हुई।

उस दिन कंपनी की क़ीमत आँकी गई करीब तेरह अरब डॉलर। और जैसे ही कारोबार शुरू हुआ, फाल्गुनी नायर देश की सबसे अमीर ‘सेल्फ़-मेड’ महिला बन गईं — वो औरत जिसने अपनी दौलत ख़ुद कमाई, किसी से विरासत में नहीं पाई।

अख़बारों में तस्वीरें छपीं। फाल्गुनी अपनी बेटी और बेटे के साथ खड़ी थीं — अद्वैता, जो अब नायका फ़ैशन की सीईओ थी, और अंचित, जो ब्यूटी कारोबार संभाल रहा था। वही बेटी, जिसकी एक छोटी-सी बात ने नौ साल पहले उस शाम को जन्म दिया था।

लिस्टिंग से पहले फाल्गुनी ने सिर्फ़ इतना कहा —

“मैंने पचास की उम्र में, बिना किसी तजुर्बे के नायका शुरू की थी। मुझे उम्मीद है कि ये सफ़र आप सबको अपनी ज़िंदगी का नायक बनने की प्रेरणा देगा।”


अक्सर हमें यही सिखाया जाता है कि बड़े फ़ैसले जवानी में लिए जाते हैं। कि एक उम्र के बाद इंसान को बस वो सब बचाना होता है जो उसने कमाया है।

फाल्गुनी नायर ने इसका उल्टा माना।

उन्होंने सोचा कि पचास की उम्र वो वक़्त है जब इंसान पहली बार ठीक से समझता है कि किस चीज़ का जोखिम उठाना ज़रूरी है। कि सबसे ख़तरनाक जगह आराम होती है — वो कुर्सी जिस पर बैठे-बैठे आप भूल जाते हैं कि आप और क्या कर सकते थे।

उन्होंने वो कुर्सी छोड़ दी।

और जो खाली जगह उन्हें एक डाइनिंग टेबल पर बेटी की एक लाइन में दिखी थी — उसे उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा काम बना दिया।

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