पहला घुमाव सबसे भारी था।
मंदराचल पर्वत, जिसकी चोटी बादलों में खोई रहती थी, क्षीरसागर के बीचों-बीच खड़ा था — और उसकी कमर पर लिपटा था नागराज वासुकि। एक सिरे पर उसका फन था, जिसे असुरों के हज़ारों हाथों ने जकड़ रखा था। दूसरे सिरे पर उसकी पूँछ थी, जिसे देवताओं ने थाम रखा था। बीच में वह खुद था — एक जीवित रस्सी, जिसकी हर कुंडली पर एक पूरे पर्वत का बोझ था।
किसी ने शंख फूँका। असुरों ने खींचा। पर्वत घूमा, और उसकी चट्टानें वासुकि की पसलियों में धँस गईं।
यहीं से समुद्र मंथन की कहानी शुरू होती है — अमृत से नहीं, उस पहली कराह से, जो सागर के शोर में किसी को सुनाई नहीं दी।
पहला घुमाव — जब मंदराचल ने सागर को चीरा
इस दिन तक पहुँचने में देवताओं को बहुत कुछ खोना पड़ा था। विष्णु पुराण कहता है कि दुर्वासा ऋषि के शाप ने इंद्र से उनकी श्री छीन ली थी, और श्री के जाते ही स्वर्ग का तेज बुझने लगा। असुरों ने मौका देखा और देवताओं को बार-बार हराया।
हारे हुए देवता विष्णु के पास पहुँचे, और विष्णु ने ऐसी सलाह दी जो किसी को अच्छी नहीं लगी — “जिनसे लड़ रहे हो, उन्हीं के साथ मिलकर सागर मथो। अमृत निकलेगा। जब तक काम पूरा न हो, दुश्मन से भी संधि रखो।”
भागवत पुराण के आठवें स्कंध में लिखा है कि देवता और असुर मिलकर मंदराचल को उखाड़ लाए, पर उसका भार उनसे सँभला नहीं। पर्वत रास्ते में गिरा और कई योद्धा उसके नीचे कुचल गए। तब विष्णु ने उसे एक हाथ से उठाकर गरुड़ की पीठ पर रखा और सागर के बीच उतार दिया।
वासुकि को अमृत में हिस्से का वचन देकर रस्सी बनने के लिए राज़ी किया गया।
सिर की ज़िद और वासुकि की साँसें
मंथन शुरू होने से ठीक पहले एक छोटी-सी बात पर झगड़ा हुआ।
विष्णु ने आगे बढ़कर नाग का फन वाला सिरा पकड़ लिया, और देवता उनके पीछे हो लिए। असुर भड़क उठे। “पूँछ पकड़ना अशुभ है,” उन्होंने कहा, “हम वेद पढ़े हुए हैं, ऊँचे कुल के हैं। हम पूँछ नहीं पकड़ेंगे।”
विष्णु मुस्कुराए, फन छोड़ दिया, और देवताओं के साथ पूँछ की ओर चले गए।
असुरों ने अपनी ज़िद जीत ली थी। उन्हें नहीं पता था कि उन्होंने क्या जीता है।
जैसे-जैसे पर्वत घूमा, वासुकि की साँसें तेज़ होती गईं। उसके हज़ार मुखों से धुआँ और आग की लपटें निकलने लगीं। भागवत कहता है कि फन की ओर खड़े असुर उस गर्मी में ऐसे झुलस गए जैसे जंगल की आग में पेड़। पूँछ की ओर खड़े देवताओं पर विष्णु ने बादल भेज दिए, जो ठंडी फुहार बरसाते रहे।
फिर पर्वत डूबने लगा। उसके नीचे कोई आधार नहीं था, और वह अपने ही भार से सागर की तली की ओर धँसता जा रहा था। तब विष्णु ने कच्छप का रूप लिया — एक विशाल कछुआ, जिसकी पीठ एक द्वीप जितनी चौड़ी थी — और मंदराचल को अपनी पीठ पर उठा लिया।
भागवत में एक पंक्ति है जो अक्सर छूट जाती है। विष्णु ने असुरों में असुरों का बल बनकर प्रवेश किया, देवताओं में देवताओं का बल बनकर — और वासुकि में वे नींद बनकर उतरे।
जिसके हिस्से में सबसे ज़्यादा दर्द आया था, भगवान ने उसे नींद दी।
हलाहल — समुद्र मंथन की कहानी का सबसे अंधेरा पल
मंथन चलता रहा। सागर उबलने लगा। मछलियाँ, मगर, और गहराई के वे जीव जिन्होंने कभी रोशनी नहीं देखी थी, पर्वत की रगड़ में पिसने लगे।
और तब सागर से जो पहली चीज़ निकली, वह कोई रत्न नहीं थी।
वह हलाहल था — एक काला, जलता हुआ विष, जो हर दिशा में फैलने लगा। जहाँ तक उसकी भाप पहुँचती, वहाँ की हवा साँस लेने लायक नहीं रहती।
वाल्मीकि रामायण के बालकांड में इस विष का जन्म कुछ और ढंग से बताया गया है। वहाँ लिखा है कि मंथन की पीड़ा में वासुकि के फनों से विष फूट पड़ा, जो चट्टानों को काटने लगा — और वही हलाहल बना। भागवत में यह विष सागर से उठता है। दोनों ग्रंथ एक बात पर सहमत हैं: जो सबसे पहले निकला, वह मौत थी।
देवता भागे। असुर भागे। प्रजापति भागे। जिन हाथों ने अभी-अभी अमृत के लालच में पर्वत घुमाया था, वे सब एक ही दिशा में दौड़ रहे थे — कैलाश की ओर।
नीलकंठ, लक्ष्मी और अमृत का कलश
शिव ने सबकी बात सुनी। फिर उन्होंने भवानी की ओर देखा।
भागवत कहता है कि भवानी अपने पति की शक्ति जानती थीं, इसलिए उन्होंने सहमति दी। शिव ने उस फैलते हुए विष को अपनी हथेली में समेटा और पी गए।
विष न नीचे उतरा, न बाहर आया। वह उनके कंठ में ठहर गया, और वहाँ की त्वचा नीली पड़ गई। उस दिन से वे नीलकंठ कहलाए।
पीते समय कुछ बूँदें ज़मीन पर गिर गई थीं। भागवत के अनुसार उन्हें बिच्छुओं, साँपों और ज़हरीली वनस्पतियों ने ग्रहण कर लिया — इसीलिए आज भी उनमें विष है।
इसके बाद मंथन फिर शुरू हुआ, और इस बार सागर देने लगा।
सबसे पहले कामधेनु निकली, जिसे ऋषियों ने यज्ञ के लिए रख लिया। फिर सफ़ेद घोड़ा उच्चैःश्रवा, जिस पर असुरराज बलि का मन आ गया। फिर चार दाँतों वाला ऐरावत हाथी। फिर कौस्तुभ मणि, जो विष्णु के वक्ष पर सजी। फिर पारिजात का वृक्ष, और अप्सराएँ। विष्णु पुराण और महाभारत में चंद्रमा भी इसी मंथन से निकलता है।
फिर सागर शांत हुआ, और लक्ष्मी प्रकट हुईं। उन्होंने देवताओं, असुरों, ऋषियों — सबको देखा, और कमल की माला विष्णु के गले में डाल दी। जिस श्री के खोने से यह सब शुरू हुआ था, वह लौट आई थी।
उसके बाद वारुणी निकली, जिसे असुरों ने ले लिया।
और आख़िर में धन्वंतरि प्रकट हुए — साँवले, पीले वस्त्र पहने, हाथ में अमृत का कलश लिए।
असुरों ने कलश छीन लिया, और आपस में लड़ने लगे कि पहले कौन पिएगा। तभी विष्णु मोहिनी बनकर उनके बीच आए, और असुर इतने मोहित हुए कि कलश उन्हीं को सौंप दिया। मोहिनी ने अमृत देवताओं को पिलाया।
एक असुर, राहु, देवताओं का वेश धरकर सूर्य और चंद्रमा के बीच बैठ गया। अमृत की घूँट उसके गले तक पहुँची ही थी कि सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया। सुदर्शन चक्र ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया — पर सिर अमर हो चुका था। कहते हैं, वह आज भी सूर्य और चंद्र से बदला लेने आता है, और हम उसे ग्रहण कहते हैं।
जब सब अपना हिस्सा लेकर चले गए
देवताओं को अमृत मिला। ऋषियों को कामधेनु। इंद्र को ऐरावत। विष्णु को लक्ष्मी और कौस्तुभ। असुरों को वारुणी, और एक हार जो उन्हें आने वाले युद्ध में मिलने वाली थी।
मंदराचल अपनी जगह लौट गया। कच्छप सागर की गहराई में उतर गया। सागर धीरे-धीरे शांत हो गया।
और वासुकि?
वह पर्वत से धीरे-धीरे खुला। उसके शल्क छिल चुके थे, कुंडलियों पर चट्टानों के निशान थे, फनों के पास उसकी अपनी आग की कालिख जमी थी। उसे अमृत में हिस्से का वचन दिया गया था। ग्रंथ इस पर लगभग चुप हैं कि वह वचन कैसे निभाया गया।
समुद्र मंथन की कहानी में अमृत सबको याद रहता है, रत्न सबको याद रहते हैं, राहु का कटा सिर तक याद रहता है। रस्सी किसी को याद नहीं रहती।
पर एक ने याद रखा।
कैलाश पर जिसके कंठ में वह विष आज भी ठहरा है, उसी कंठ पर वासुकि आज भी लिपटा रहता है। उस दिन सागर किनारे सिर्फ़ दो ही थे जिन्होंने दूसरों का दर्द अपने शरीर पर लिया था।
शायद इसीलिए वे साथ हैं।
समुद्र मंथन की कहानी के बारे में आम सवाल
समुद्र मंथन से कितने रत्न निकले थे? परंपरा में इन्हें चौदह रत्न कहा जाता है, पर हर ग्रंथ की सूची थोड़ी अलग है। भागवत पुराण में हलाहल, कामधेनु, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, कौस्तुभ, पारिजात, अप्सराएँ, लक्ष्मी, वारुणी और धन्वंतरि के साथ अमृत आते हैं, जबकि विष्णु पुराण और महाभारत में चंद्रमा भी जुड़ता है।
शिव जी नीलकंठ क्यों कहलाए? मंथन से निकले हलाहल विष से तीनों लोक जलने लगे थे, तब शिव ने उसे पी लिया। विष उनके कंठ में ही रुक गया और कंठ नीला पड़ गया, इसलिए वे नीलकंठ कहलाए।
समुद्र मंथन क्यों हुआ था? विष्णु पुराण के अनुसार दुर्वासा ऋषि के शाप से देवताओं की श्री चली गई थी और वे असुरों से हारने लगे थे। खोई हुई शक्ति और अमरता पाने के लिए विष्णु की सलाह पर देवताओं ने असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर मथा।
कथा के स्रोत
यह कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 8, अध्याय 6 से 9) पर आधारित है। दुर्वासा के शाप का प्रसंग विष्णु पुराण (अंश 1, अध्याय 9) से, वासुकि के फनों से विष निकलने का प्रसंग वाल्मीकि रामायण (बालकांड, सर्ग 45) से, और चंद्रमा का उल्लेख महाभारत (आदिपर्व, आस्तीक पर्व) से लिया गया है। वासुकि के मन की भावनाएँ और अंत का शिव-वासुकि वाला अर्थ लेखक की अपनी व्याख्या है।
