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राजा हरिश्चंद्र की कहानी — जिस राजा ने सब कुछ दिया, उसे अंत में माँगना पड़ा

Rajhussain · 21-October-2026 7 मिनट में पढ़ें
राजा हरिश्चंद्र की कहानी — जिस राजा ने सब कुछ दिया, उसे अंत में माँगना पड़ा

मुकुट उतारना आसान था। मुश्किल यह थी कि उसे रखें कहाँ।

अयोध्या के राजसिंहासन के सामने खड़े हरिश्चंद्र के हाथ में सोने का वह मुकुट था जिसे उनके पिता त्रिशंकु ने पहना था, और उनसे पहले उनके पूर्वजों ने। सामने ऋषि विश्वामित्र बैठे थे — चुप, जैसे प्रतीक्षा कर रहे हों कि राजा अब भी पीछे हट जाए। राजा हरिश्चंद्र की कहानी लोग अक्सर इसी वाक्य से शुरू करते हैं कि उन्होंने राज्य दान कर दिया। पर उस पल का सच यह था कि दान देने वाला हाथ काँप रहा था — और फिर भी रुका नहीं।

“यह पृथ्वी, यह कोष, यह सेना, यह नगर — सब आपका है, मुनिवर,” हरिश्चंद्र ने कहा। “मेरे पास अब सिर्फ़ मेरा शरीर, मेरी पत्नी और मेरा पुत्र बचे हैं।”

विश्वामित्र के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। “और दक्षिणा?”

सभा में सन्नाटा फैल गया। दान के बाद दक्षिणा न दी जाए, तो दान अधूरा रहता है — यह हरिश्चंद्र जानते थे। पर जिसने सब कुछ दे दिया हो, वह दक्षिणा किस चीज़ से दे?

“एक महीना दीजिए, मुनिवर,” राजा ने कहा। “दक्षिणा चुका दूँगा।”

अयोध्या का वो द्वार, जहाँ राजा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा

रानी शैव्या ने अपने गहने एक-एक करके उतारे और राजकोष के ढेर पर रख दिए। छोटा रोहिताश्व समझ नहीं पा रहा था कि माँ के कंगन क्यों उतर रहे हैं, और पिता ने रेशमी वस्त्र की जगह पेड़ की छाल क्यों पहन ली है।

नगर की गलियों में लोग रो रहे थे। कोई राजा के पाँव पकड़ लेता, कोई रास्ते में लेट जाता। “महाराज, हमें किसके भरोसे छोड़े जा रहे हैं?”

हरिश्चंद्र ने किसी की ओर नहीं देखा। देखते, तो शायद रुक जाते।

रानी थकी हुई थीं और धीरे चल रही थीं — एक हाथ में बेटे का हाथ, दूसरे में अपना आँचल। तभी पीछे से विश्वामित्र का डंडा उनकी पीठ पर पड़ा। “जल्दी चलो। यह धरती अब मेरी है।”

राजा ने वह प्रहार देखा। उनकी मुट्ठी भिंच गई। पर जिस धरती पर वे खड़े थे, वह अब उनकी नहीं थी। उस धरती पर न्याय करने का अधिकार भी वे आज सुबह दान कर चुके थे।

उन्होंने सिर्फ़ इतना किया कि रानी का हाथ थाम लिया। और चलते रहे।

काशी का बाज़ार — जहाँ राजा हरिश्चंद्र ने अपने ही घर की बोली सुनी

वे काशी पहुँचे, क्योंकि काशी शिव की नगरी है — किसी राजा की नहीं। वहाँ की मिट्टी पर पाँव रखकर हरिश्चंद्र ने पहली बार राहत की साँस ली। कम से कम यह ज़मीन उन्होंने दान में नहीं दी थी।

महीना बीतता गया। दक्षिणा का एक सिक्का भी नहीं जुड़ा। और आख़िरी दिन विश्वामित्र फिर सामने खड़े थे।

उस शाम शैव्या ने वह कहा जो कोई राजा अपनी रानी के मुँह से सुनना नहीं चाहता। “मुझे बेच दीजिए। आपका वचन मुझसे बड़ा है।”

हरिश्चंद्र की आँखें पहली बार भीगीं। जिस स्त्री को अयोध्या ने महारानी कहा था, वह काशी के बाज़ार में एक ब्राह्मण के घर दासी बनकर बिक गई। रोहिताश्व माँ का आँचल पकड़े पीछे-पीछे चला गया। जाते हुए उसने एक बार मुड़कर पिता की ओर देखा।

वो नज़र हरिश्चंद्र पूरी उम्र नहीं भूले।

फिर भी दक्षिणा पूरी न हुई। तब राजा ने ख़ुद को बेचा — एक चांडाल को, जो काशी के श्मशान का स्वामी था। काम था: वहाँ आने वाले हर शव से कर वसूलना, कफ़न का हिस्सा लेना, और बिना कर चुकाए किसी चिता को आग न लगने देना।

सूर्यवंश का राजा अब मरघट का पहरेदार था।

श्मशान की वो रात

दिन महीने बने, महीने बरस। हरिश्चंद्र की दाढ़ी बढ़ गई, हाथ धुएँ से काले पड़ गए। रात को वे जलती चिताओं के बीच बैठे रहते और कभी-कभी सोचते — शैव्या कैसी होगी? रोहिताश्व अब कितना बड़ा हो गया होगा?

उधर ब्राह्मण के घर, एक सुबह रोहिताश्व बाकी बच्चों के साथ कुशा और लकड़ी लेने गया। झाड़ी के नीचे एक साँप छिपा था। बच्चे की चीख़ बहुत छोटी थी।

उसी रात, अँधेरे और बारिश के बीच, एक स्त्री श्मशान पहुँची। उसकी गोद में एक बच्चे का शरीर था। वह ऐसे रो रही थी कि शब्द टूट-टूटकर निकल रहे थे — “हे राजा… तुम कहाँ हो… देखो, तुम्हारा बेटा…”

पहरेदार उठा। आवाज़ जानी-पहचानी थी। चिता की रोशनी में उसने बच्चे का चेहरा देखा।

और हरिश्चंद्र वहीं घुटनों के बल गिर पड़े।

राजा हरिश्चंद्र की कहानी का सबसे कठोर क्षण

दुःख की पहली लहर गुज़री, तो एक सवाल सामने खड़ा था — ऐसा सवाल, जिसका जवाब कोई पिता कभी नहीं देना चाहेगा।

स्वामी का आदेश था: कर के बिना कोई चिता नहीं जलेगी।

शैव्या ने पति को पहचान लिया था। वह उनकी ओर ऐसे देख रही थी जैसे कह रही हो — अब तो नियम बीच में मत लाना। यह हमारा बेटा है।

हरिश्चंद्र ने अपनी आवाज़ को स्थिर किया, और वह वाक्य कहा जो उनके जीवन का सबसे भारी वाक्य था।

“देवी, मैं इस श्मशान का सेवक हूँ। कर दिए बिना मैं इस चिता को आग नहीं दे सकता।”

जिस राजा ने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा था, जिसने पूरी पृथ्वी दान कर दी थी — आज उसे अपनी ही पत्नी से, अपने ही बेटे की चिता के लिए, मूल्य माँगना पड़ा। जो सत्य उन्हें दानी बनाता था, वही सत्य आज उनसे वसूली करवा रहा था। सत्य की कीमत देना कठिन था। उसकी कीमत वसूलना उससे भी कठिन निकला।

शैव्या के पास कुछ नहीं था। बस वह साड़ी जो उसने पहन रखी थी। उसने उसका किनारा पकड़ा, और उसे आधा फाड़ने लगी।

जब आकाश बोल उठा

कपड़ा फटने की आवाज़ के साथ ही श्मशान में प्रकाश फैल गया।

चांडाल का रूप बदल गया — वह स्वयं धर्मराज थे। उनके साथ इंद्र थे, देवता थे, और विश्वामित्र भी। रोहिताश्व ने आँखें खोलीं, जैसे किसी लंबी नींद से जागा हो।

“हरिश्चंद्र,” धर्म ने कहा, “तुम्हारी परीक्षा पूरी हुई। स्वर्ग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।”

धुएँ से काला, थका हुआ वह आदमी कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, “अयोध्या की प्रजा मेरे पीछे रोती रह गई थी। उन्हें छोड़कर मैं अकेला स्वर्ग नहीं जाऊँगा।”

पुराण कहता है, राजा हरिश्चंद्र अपनी प्रजा को साथ लेकर स्वर्ग गए।

जिस आदमी से भाग्य ने सब कुछ छीन लिया था, उसने आख़िरी बार भी देने की ही बात की — इस बार अपना स्वर्ग।


इस कथा से जुड़े सवाल

राजा हरिश्चंद्र की कहानी किस पुराण में है? यह कथा सबसे विस्तार से मार्कण्डेय पुराण के आरंभिक अध्यायों (अध्याय 7–8) में मिलती है, और देवी भागवत पुराण के सातवें स्कंध में भी कुछ बदलावों के साथ आती है। ऐतरेय ब्राह्मण में हरिश्चंद्र का नाम शुनःशेप की एक अलग कथा में आता है।

राजा हरिश्चंद्र की पत्नी का नाम तारामती था या शैव्या? मार्कण्डेय पुराण में रानी का नाम शैव्या है। तारामती नाम बाद की लोक-परंपराओं, नाटकों और फ़िल्मों में ज़्यादा प्रचलित हुआ, इसलिए दोनों नाम एक ही रानी के लिए लिए जाते हैं।

हरिश्चंद्र की परीक्षा किसने ली थी? कथा के अनुसार परीक्षा ऋषि विश्वामित्र ने ली, और जिस चांडाल के यहाँ हरिश्चंद्र ने सेवा की, वह स्वयं धर्मराज थे। परीक्षा यह थी कि हर हानि के बाद भी कोई मनुष्य अपने वचन पर टिका रह सकता है या नहीं।

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