समंदर की उस तह पर, जहाँ सूरज की रोशनी पानी में घुलकर हरी हो जाती थी, एक मछली रहती थी जिसके शरीर पर सात रंग चमकते थे — लाल, नीला, पीला, हरा, बैंगनी, नारंगी और सुनहरा। उसका नाम किसी ने नहीं रखा था, सब उसे बस “रंगीन मछली” कहते थे।
एक दिन एक छोटा केकड़ा रेत में दुबका बैठा था, अपने टूटे हुए पंजे को छुपाते हुए। रंगीन मछली उसके पास गई और बोली, “क्या हुआ?”
केकड़े ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी आँखों में पानी भर आया — समंदर में आँसू कोई नहीं देख पाता, लेकिन रंगीन मछली ने देख लिया।
उसने अपने शरीर से एक हल्की सी थरथराहट महसूस की, और उसका लाल रंग धीरे-धीरे उतरकर पानी में घुल गया, और जाकर केकड़े के टूटे पंजे पर बैठ गया। पंजा अब लाल चमकने लगा, जैसे किसी ने उस पर मरहम लगा दिया हो। केकड़ा हँसा। पहली बार उस दिन।
रंगीन मछली ने अपने शरीर की तरफ देखा। अब वो छः रंगों वाली थी। पर उसे अजीब नहीं लगा। उसे हल्का लगा।
कुछ दिन बाद एक बूढ़ी सीप मिली, जो अपनी सीपी के अंदर छुप गई थी और बाहर ही नहीं आ रही थी। रंगीन मछली ने उससे पूछा तो सीप ने धीमी आवाज़ में कहा, “मेरे अंदर अब कोई मोती नहीं बनता। मैं किसी काम की नहीं रही।”
रंगीन मछली थोड़ी देर चुप रही। फिर उसका नीला रंग उतरा और सीप के खोल के अंदर जाकर बैठ गया, जहाँ अंधेरा था। अब उस अंधेरे में एक नीली रोशनी टिमटिमाने लगी थी। सीप धीरे-धीरे बाहर निकली, अपने नए नीले उजाले के साथ।
ऐसे ही, एक-एक करके, रंगीन मछली के रंग कम होते गए — पीला रंग एक डरी हुई छोटी मछली के पास गया जो स्कूल में पहली बार अकेली तैर रही थी। हरा रंग एक बूढ़े कछुए के पास गया जो याद नहीं कर पा रहा था कि उसका घर किस दिशा में है। बैंगनी, नारंगी, और आख़िर में सुनहरा रंग भी — एक के बाद एक — किसी न किसी के पास चला गया, जिसे उस दिन किसी रोशनी की ज़रूरत थी।
एक शाम, रंगीन मछली पानी में तैर रही थी, और उसने अपने शरीर की तरफ देखा। अब वहाँ कोई रंग नहीं था। बस एक हल्की, पारदर्शी देह — जिसमें से पानी आर-पार दिखता था।
उसे थोड़ा डर लगा। उसने सोचा, “अब मैं कौन हूँ?”
वो धीरे-धीरे तैरती हुई समंदर की उस जगह पहुँची जहाँ सब इकट्ठा होते थे — केकड़ा, सीप, छोटी मछली, कछुआ, और बाकी सब जिन्हें वो रंग दे चुकी थी। जैसे ही वो पास आई, हर किसी का रंग हल्के से चमका — जैसे उसे पहचान रहे हों।
केकड़े ने अपना लाल पंजा उठाया। सीप ने अपनी नीली चमक दिखाई। छोटी मछली पीली रोशनी में मुस्कुराई।
रंगीन मछली समझ गई — उसके रंग कहीं गए नहीं थे। वो बस बँट गए थे, और अब हर जगह थे, सबकी देह पर, सबकी हँसी में।
उस रात, जब चाँद की रोशनी पानी में उतरी, रंगीन मछली ने अपने पारदर्शी शरीर से चाँद को आर-पार चमकते देखा। पहली बार उसे लगा कि वो जितनी खाली है, उतनी ही भरी हुई भी है।
वो धीरे से मुस्कुराई — एक मछली जिसके पास अब कोई रंग नहीं था, और शायद इसीलिए, वो सबसे ज़्यादा रोशन थी।