Moral

जो माँगा था, वही मिला

Rajhussain · 05-July-2026 8 मिनट में पढ़ें
जो माँगा था, वही मिला

काशी के घाटों पर शाम उतर रही थी जब सेठ धनराज शर्मा ने अपने नौकर से कहा — “रथ रोको।”

मणिकर्णिका के पास, एक पीपल के नीचे, वो सदाशिव गोस्वामी बैठे थे जिनके बारे में पूरे बनारस में एक ही बात कही जाती थी — “जो माँगो, वही मिलता है। लेकिन सोच-समझकर माँगना।”

धनराज पचपन साल का था। शहर के सबसे बड़े कपड़े के व्यापारी। तीन हवेलियाँ, ग्यारह दुकानें, और एक पत्नी जो उसके लिए हर सुबह तुलसी का पानी छानती थी। फिर भी, पिछले छह महीने से रात को नींद नहीं आती थी। क्यों — ये वो ख़ुद नहीं जानता था।

उसने सोचा था कि बाबा से मिलकर मन हल्का हो जाएगा। पर अब, सामने बैठा हुआ, उसने सोचा — जब इतनी दूर आ ही गया हूँ, तो कुछ माँग ही लेता हूँ।

सदाशिव बाबा ने आँखें खोलीं। न मुस्कुराए, न नाराज़ हुए। बस देखा।

“बोलो।”

धनराज ने हाथ जोड़े। उसने बहुत सोच-समझकर बात की — आख़िर वो व्यापारी था, शब्दों का मोल जानता था।

“बाबा, तीन चीज़ें माँगता हूँ। एक — मेरा व्यापार इतना बढ़े कि बनारस का हर आदमी मेरा नाम जाने। दो — मेरा बेटा रोहित मेरे जैसा बने, मेरी तरह सोचे, मेरी तरह काम करे। और तीन — मुझे कभी किसी पर भरोसा करने की ज़रूरत न पड़े। मैं अपने आप में पूरा रहूँ।”

बाबा ने एक पल रुककर देखा।

“पक्का?”

“पक्का बाबा।”

“सोच लो। एक बार और।”

धनराज को थोड़ा गुस्सा आया — मैं बच्चा हूँ क्या? पर ज़ाहिर नहीं किया।

“पक्का बाबा। यही तीन।”

सदाशिव ने सिर हिलाया। बहुत धीरे से।

“तथास्तु।”

बस इतना। फिर आँखें बंद कर लीं।

धनराज को एक पल के लिए लगा — बस? कोई मंत्र नहीं, कोई भस्म नहीं? पर वो उठ खड़ा हुआ। दान-दक्षिणा देने लगा तो बाबा ने हाथ के इशारे से मना कर दिया।

रथ में बैठते हुए धनराज ने पीछे मुड़कर देखा। बाबा वैसे ही बैठे थे। पीपल के पत्ते हिल रहे थे। और कुछ नहीं।


पहला साल।

व्यापार बढ़ा। ऐसा बढ़ा कि धनराज ख़ुद हैरान था।

लखनऊ से ऑर्डर आने लगे। फिर इलाहाबाद से। फिर दिल्ली से। एक नवाब साहब ने उसकी दुकान से सौ जोड़े बनारसी साड़ियाँ मँगवाईं — अपनी बेटी की शादी के लिए। अख़बार में नाम छपा। फिर रेडियो पर। फिर एक हिंदी फिल्म में हीरोइन ने उसकी ही दुकान की साड़ी पहनी।

बनारस का हर आदमी उसका नाम जानने लगा।

धनराज ख़ुश था। बहुत ख़ुश। हर सुबह वो आईने में देखता और सोचता — बाबा ने सच कहा था।


तीसरा साल।

रोहित बीस साल का हो गया। पढ़ाई से लौटा। और जैसे रातों-रात बदल गया।

पहले वो शाम को घर आता तो माँ के पास बैठकर मूँगफली खाता था। अब सीधे दफ्तर जाता। हिसाब-किताब देखता। मुनीम से तीखी बहस करता। एक दिन धनराज ने देखा — रोहित एक पुराने नौकर को डाँट रहा था बिल्कुल उसी तरह जैसे वो ख़ुद डाँटता था। वही शब्द। वही चेहरा। वही ठंडी आवाज़।

धनराज को पहले एक पल के लिए गर्व हुआ — मेरा बेटा है।

फिर एक हल्की-सी बेचैनी हुई। जैसे आईने में अपना ही चेहरा देखकर थोड़ा अजीब लगता है।

उस रात उसकी पत्नी ने कहा — “रोहित आजकल मुझसे ज़्यादा बात नहीं करता।”

धनराज ने कहा — “बड़ा हो रहा है। ये उम्र होती है।”

पर पत्नी बोली — “नहीं जी। वो आपके जैसा होता जा रहा है। और आप भी मुझसे बीस साल पहले बात करना बंद कर चुके हैं।”

धनराज कुछ कहना चाहता था। पर कुछ कहा नहीं।


पाँचवाँ साल।

व्यापार और बढ़ा। अब उसकी फ़र्म के विज्ञापन कलकत्ता के अख़बारों में छपते थे। उसने अपने मुनीम को निकाल दिया — पच्चीस साल पुराने मुनीम को — क्योंकि “अब मुझे किसी और के हिसाब पर भरोसा करने की ज़रूरत नहीं। मैं ख़ुद सब देख लूँगा।”

मुनीम जाते वक़्त रोया। धनराज ने नहीं देखा।

वो हिसाब ख़ुद देखने लगा। रात के दो बजे तक। कोई काग़ज़ बिना उसकी मुहर के नहीं जाता था। एक बार उसकी पत्नी ने कहा — “जी, थोड़ा आराम कर लीजिए।” उसने जवाब दिया — “तुम्हें व्यापार की समझ नहीं है।”

पत्नी चुप हो गई। फिर हमेशा के लिए चुप हो गई।

बीमारी क्या थी, ये डॉक्टर भी ठीक से नहीं बता पाए। बस एक दिन सुबह उठी ही नहीं। पाँच महीने पहले ही उसने धनराज से कुछ कहा था — “जी, मैं ठीक नहीं हूँ।” धनराज ने कहा था — “वैद्य को बुलाओ, मैं दफ्तर से लौटकर देखूँगा।” लौटा नहीं। फिर भूल गया।

जब वो उसकी चिता को अग्नि दे रहा था, मणिकर्णिका के घाट पर, उसने एक पल के लिए ऊपर देखा। पीपल का वही पेड़ अभी भी वहाँ था। बाबा नहीं थे। पर पेड़ था।

धनराज को कुछ नहीं लगा। उसने सोचा — कुछ क्यों नहीं लग रहा? पर इसका जवाब भी उसने ख़ुद से नहीं पूछा।


सातवाँ साल।

रोहित की शादी हुई। बहू आई। तीन महीने बाद चली गई — मायके। फिर लौटी नहीं।

रोहित ने धनराज से कहा — “पिताजी, कोई बात नहीं। औरतें ऐसी ही होती हैं। काम पर ध्यान दीजिए।”

धनराज ने सिर हिलाया। फिर एक रात, बहुत देर बाद, उसने सोचा — ये बात मैंने कब कही थी? किससे कही थी?

उसे याद नहीं आया। पर शब्द उसी के थे। ये वो जानता था।


नौवाँ साल।

धनराज पैंसठ का हो गया। शहर में उसका नाम था। पर अब कोई उसे “धनराज भैया” नहीं कहता था। सब “सेठ साहब” कहते थे। दूर से। हाथ जोड़कर।

एक दिन उसकी पुरानी दुकान का एक नौकर — रामू, जो तीस साल से उसके साथ था — रिटायर हो रहा था। धनराज ने उसे विदाई पर बुलाया।

रामू आया। हाथ जोड़े। फिर थोड़ा झिझकते हुए बोला — “सेठ साहब, एक बात कहूँ?”

“कहो।”

“आप जब चालीस साल के थे, तब हम साथ चाय पीते थे। आपको याद है?”

धनराज को याद नहीं था। पर उसने सिर हिलाया।

“उस वक़्त आप हँसते बहुत थे साहब। बहुत। मुझे आज भी याद है।”

रामू चला गया।

धनराज देर तक खिड़की के पास खड़ा रहा। बनारस की गलियाँ नीचे थीं। दुकानें थीं। उसका नाम था हर तरफ़। पर वो हँसी — वो याद नहीं आ रही थी। कैसी थी? कब आख़िरी बार आई थी?

उसने कोशिश की — हँसने की। ख़ुद से। आईने के सामने।

हँसी नहीं आई।


दसवाँ साल।

एक शाम, बारिश हो रही थी। धनराज अकेला बैठा था। रोहित विदेश में था, किसी बड़े सौदे पर। नौकर थे, पर सब डरते थे — उसके पास आते नहीं थे जब तक बुलाया न जाए।

उसने एक नौकर से कहा — “रथ निकालो।”

“कहाँ साहब?”

“मणिकर्णिका।”

बारिश में, घाट पर, वो उसी पीपल के नीचे पहुँचा।

बाबा वहाँ नहीं थे। दस साल हो गए थे। हो सकता है मर गए हों। हो सकता है कहीं और चले गए हों।

पर पेड़ था। और एक पल के लिए धनराज को लगा — जैसे कोई बैठा है। कोई जो उसकी बात सुन रहा है।

उसने वहीं बैठकर, ज़ोर से, अकेले, कहा —

“बाबा, आपने मुझे वही दिया जो मैंने माँगा।”

पीपल हिला। बारिश की एक बूँद उसके माथे पर गिरी।

“मेरा व्यापार इतना बड़ा है कि हर कोई मेरा नाम जानता है। पर मेरा नाम लेकर कोई बात नहीं करता। सब डरते हैं।”

“मेरा बेटा बिल्कुल मेरे जैसा है। और मैं उससे बात नहीं कर सकता — क्योंकि वो मेरी ही भाषा बोलता है, और वो भाषा प्यार के लिए बनी ही नहीं थी।”

“और किसी पर भरोसा करने की मुझे ज़रूरत नहीं — क्योंकि मेरे पास भरोसा करने को कोई बचा ही नहीं।”

वो रुका। हवा चल रही थी।

“बाबा, आपने मुझे शाप नहीं दिया।”

“आपने सिर्फ़ ध्यान से सुना।”

पीपल के पत्ते हिलते रहे। ऊपर, कहीं, बारिश तेज़ हो गई। धनराज वहीं बैठा रहा। बहुत देर तक।

उसने सोचा — काश बाबा ने उस दिन कहा होता, “सोच लो, एक बार और।”

फिर उसे याद आया।

बाबा ने कहा था।

दो बार।


घाट खाली था। पीपल भीगता रहा। और काशी की उस शाम में, एक आदमी अपनी ही बनाई दुनिया के बीचों-बीच बैठा, समझ रहा था कि उसने दस साल पहले, बहुत साफ़ शब्दों में, अपने जीवन का नक़्शा ख़ुद खींचा था।

बाबा ने सिर्फ़ उसे फ्रेम किया था।

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