रात के पौने दो बजे मीरा की आँख खुली, और पहला ख़याल दिमाग़ में यही आया — बिस्तर पर वो अकेली क्यों तिरछी सोई है?
फिर याद आया। कोई और सिरा अब भरा नहीं जाना था। ये तलाक के बाद की कहानी का पहला हफ़्ता था, और मीरा अब भी अपने शरीर को समझा रही थी कि जगह पूरी उसकी है — फिर भी वो हर रात बिस्तर के बाएँ किनारे पर, उसी पुरानी जगह पर सिमटकर सोती। तेरह साल की आदत एक कोर्ट के फ़ैसले से नहीं टूटती।
पुणे के इस दो-कमरे के फ्लैट में अब सिर्फ़ उसकी आवाज़ गूंजती थी — बर्तन रखने की, टीवी बंद करने की, कभी-कभी बेवजह खुद से बात करने की।
पहली रात — जब बिस्तर अचानक बहुत बड़ा लगा
पहले तीन दिन मीरा ने तकिया दूसरी तरफ़ रख दिया, जैसे किसी और के लिए जगह बनाई हो। चौथी रात उसने वो तकिया हटाया, बत्ती बुझाई, और जान-बूझकर बिस्तर के बीचोंबीच लेट गई। बाहें फैलाईं। पैर फैलाए। किसी सीमा से न टकराना — ये एहसास इतना अजनबी था कि नींद आने में घंटा लग गया।
अगली सुबह उसने अपनी बहन को फ़ोन पर बताया, “कल रात मैं तिरछी सोई।”
बहन हँस पड़ी, “ये तो अच्छी बात है ना?”
मीरा कुछ देर चुप रही। “पता नहीं। अजीब लगा। जैसे मैंने कुछ चुरा लिया हो जो पहले किसी और का था।”
फ़ोन रखने के बाद उसने खिड़की खोली। नीचे सोसाइटी के गार्डन में कोई बच्चा साइकिल चला रहा था, गिर रहा था, फिर उठकर फिर चला रहा था। मीरा देर तक वहीं खड़ी रही।
दफ़्तर, डिब्बा, और वो सवाल जो कोई नहीं पूछता
काम पर लौटना सबसे आसान लगा था — कम से कम वहाँ एक टाइम-टेबल था। लेकिन दोपहर के लंच में मीरा ने पहली बार गौर किया कि उसका टिफ़िन-डिब्बा अब भी दो हिस्सों में बंटा हुआ पैक होता है, आधी रोटी-सब्ज़ी, आधी दाल-चावल — वो हिसाब जो हमेशा दो लोगों के लिए बनता था, अब सिर्फ़ उसके लिए बचा रह गया था और फिर भी वही पुराना नाप चला आता था।
सहकर्मी पूछते, “सब ठीक?” — और मीरा मुस्कुराकर कहती, “हाँ, बिल्कुल।” कोई ये नहीं पूछता, “तुमने कल रात खाना खाया या नहीं?” या “तुम अकेले घर जाकर क्या करती हो?” वो सवाल जो असली मायने रखते थे, वो किसी की ज़ुबान पर नहीं आते। दफ़्तर की सहानुभूति एक हद तक ही पहुँचती है, उसके आगे हर कोई अपनी ज़िंदगी में लौट जाता है।
शुक्रवार की शाम, जब बाक़ी सब लोग जल्दी निकल गए, मीरा अपनी सीट पर बैठी रही। घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी — और यही बात उसे सबसे ज़्यादा डरा रही थी।
तलाक के बाद की कहानी का सबसे अजीब पल — अकेले टेबल नंबर चार पर
उसी शुक्रवार, दफ़्तर से निकलकर, मीरा ने अपनी गाड़ी कोरेगांव पार्क की तरफ़ मोड़ ली — उस इटैलियन रेस्तरां की तरफ़, जहाँ वो कभी अकेले नहीं गई थी। हमेशा दो लोगों के लिए बुकिंग होती थी। आज उसने गेट पर खड़े होकर कहा, “टेबल फ़ॉर वन।”
लड़के ने बिना किसी हिचक के उसे टेबल नंबर चार पर बिठाया — खिड़की के पास, जहाँ से बाहर की सड़क दिखती थी। मीरा को यक़ीन था कि पूरा रेस्तरां उसे घूरेगा, कि वेटर तरस खाएगा, कि बगल की टेबल वाला जोड़ा उसकी तरफ़ देखकर फुसफुसाएगा। कुछ भी नहीं हुआ। किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
उसने मेन्यू खोला और पहली बार बिना किसी से पूछे ऑर्डर दिया — वो डिश जो उसे हमेशा पसंद थी लेकिन जिसे “बहुत तीखी है, मत लो” कहकर टाला जाता रहा था। खाना आया। भाप उठती रही। मीरा ने पहला निवाला लिया, और अचानक उसकी आँखों में पानी आ गया — दुख से नहीं, बल्कि इस अजीब, भारी राहत से कि वो चाहे तो पूरी प्लेट अकेले ख़त्म कर सकती है, और किसी को जवाब नहीं देना।
उसने आधा खाना पैक करवाया, बिल चुकाया, और गाड़ी तक चलते हुए सोचा — ये अकेलापन नहीं था। ये कुछ और था, जिसका नाम उसे अभी नहीं पता था।
आईने के सामने खड़ी एक नई मीरा
महीने के आख़िरी हफ़्ते में मीरा ने अलमारी का पुराना, धूल भरा शीशा साफ़ किया — वो शीशा जिसे वो सालों से टालती आई थी क्योंकि उसकी रोशनी में हर दाग़, हर थकान साफ़ दिखती थी।
उसने कपड़े बदले, बालों को खोला, और सीधे आईने में देखा। पहली बार उसने ख़ुद को “किसी की बीवी” या “किसी की एक्स” के तौर पर नहीं, बल्कि सिर्फ़ मीरा के तौर पर देखने की कोशिश की — 34 साल की, थोड़ी थकी हुई, आँखों के नीचे हल्के काले घेरे, लेकिन ठुड्डी थोड़ी ऊपर उठाए हुए।
उसे याद आया कि कॉलेज में वो पेंटिंग किया करती थी, और शादी के बाद ब्रश छूट गए थे — किसी ने मना नहीं किया था, बस वक़्त और तरजीह दोनों धीरे-धीरे किसी और चीज़ में बदल गए थे। उसने अलमारी के सबसे नीचे वाले खाने से पुराना कैनवस-बैग निकाला। रंग सूख चुके थे, ब्रश की नोकें सख़्त हो गई थीं। फिर भी उसने बैग बिस्तर के पास रख दिया — कल के लिए।
तलाक के बाद की कहानी अक्सर टूटने की कहानी मान ली जाती है। मीरा के लिए वो सिर्फ़ इतनी थी — एक औरत, एक महीना, और तिरछा सोने की धीरे-धीरे बनती आदत।
खिड़की के बाहर सोसाइटी की बत्तियाँ एक-एक करके बुझ रही थीं। मीरा ने आईना बंद किया, बत्ती नहीं बुझाई, और बिस्तर के बीचोंबीच लेट गई — बिना किसी हिचक के।
