शनि और हनुमान जी की कहानी — वो कोठरी जिसे किसी ने याद नहीं रखा
लंका के सबसे भीतरी हिस्से में एक कोठरी थी, इतनी छोटी कि उसमें खड़ा होना भी मुश्किल था। वहाँ जो…
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लंका के सबसे भीतरी हिस्से में एक कोठरी थी, इतनी छोटी कि उसमें खड़ा होना भी मुश्किल था। वहाँ जो…
पक्षीराज गरुड़ जब उड़ान भरते हैं, तो पीछे सिर्फ हवा नहीं छूटती — समय भी थोड़ा लड़खड़ा जाता है। यह…
सरयू का पानी उस दिन शांत नहीं था। अयोध्या के घाट पर हज़ारों लोग खड़े थे, पर किसी की आवाज़…
सुषेण वैद्य की आवाज़ में कंपन था। लक्ष्मण की साँसें उथली होती जा रही थीं, और उनका चेहरा उस रंग…
रात अभी पूरी तरह ढली नहीं थी कि पर्वत की गुफा में एक आवाज़ गूंजी — जो रोना कम, गर्जना…
पाताल लोक के फाटक पर मशालें नहीं जलतीं। वहाँ रोशनी पानी से आती है — नीली, ठंडी, हिलती हुई रोशनी,…
पांडवों के वनवास के दिन थे। गंधमादन पर्वत के पास डेरा था, और एक सुबह हवा के झोंके के साथ…
देवशर्मा राजदरबार का लेखक था। तीस बरस से उसकी कलम अयोध्या के हर उत्सव, हर निर्णय, हर विवाह को शब्दों…
पाताल लोक के फाटक पर एक पहरेदार अकेला खड़ा था, और वह हनुमान जी का अपना पुत्र था। हनुमान अहिरावण…
रावण की सभा में उस दिन ठहाके गूँज रहे थे। एक वानर — सिर्फ एक वानर — उसके सिंहासन के…