सुरुचि की रातें
रात के तीसरे पहर महल की खिड़की के पास एक बूढ़ी औरत बैठी थी। उसके हाथ काँप रहे थे —…
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रात के तीसरे पहर महल की खिड़की के पास एक बूढ़ी औरत बैठी थी। उसके हाथ काँप रहे थे —…
काशी के घाटों पर शाम उतर रही थी जब सेठ धनराज शर्मा ने अपने नौकर से कहा — “रथ रोको।”…
समंदर की उस तह पर, जहाँ सूरज की रोशनी पानी में घुलकर हरी हो जाती थी, एक मछली रहती थी…
सुबह छह बजे महेश की आँख खुली तो सबसे पहले उसके दाहिने हाथ ने काँपना शुरू किया। ये कोई नई…
बम्बई, 1952। रेकॉर्डिंग स्टूडियो की सीढ़ियाँ उतरते हुए ज़ोहराबाई के हाथ में वही पुराना काला पर्स था जो उन्होंने 1944…
बैग पर अब भी एक कार्टून मछली बनी थी, जिसका एक पंख धुलते-धुलते फीका पड़ गया था। मीरा कुछ देर…
एक जुलाई की सुबह, जब सातवीं बी के बच्चे अपनी नई क्लास में घुस रहे थे, हरिप्रसाद शर्मा भोपाल के…
फ़िलाडेल्फ़िया में नवंबर की वो शाम बहुत ठंडी थी। मीरा अपने हॉस्टल के कमरे में बैठी थी, सामने खुली हुई…
रात के तीसरे पहर में राजा विक्रमादित्य ने अपना मुकुट उतारा, अपनी अंगूठियाँ उतारीं, और एक फटी हुई चादर ओढ़…
यह कहानी पैसे बचाने की नहीं है — यह उस माँ की है जिसने एक सपने में निवेश किया, और…
पहले दिन वो सिक्का मिट्टी से ऐसे निकला जैसे कोई आलू निकलता है। हलधर की कुदाल टकराई, एक खनखनाहट हुई…
सुबह साढ़े पाँच बजे वो अब भी उसी आदत से उठ जाता था। बरसों की आदत। उठते ही उसके कान…
रविवार की दोपहर थी। बाहर पुणे की गर्मी अपने आखिरी दिन गिन रही थी, और बरामदे में पापा अपनी उसी…
12 मई, 1767 की दोपहर थी। महेश्वर के राजमहल के पीछे, नर्मदा के किनारे, एक चिता तैयार हो रही थी।…
बंद कमरे की खिड़की से बाहर मुंबई जाग रही थी — हॉर्न, कौवे, किसी इमारत में चलता पानी का मोटर।…